Wednesday, 19 October 2011

आकाश की हद तक { कविता संग्रह } नीलम सिंह

वागर्थ अक्टूबर २०११ में प्रकाशित नीलम सिंह के कविता संग्रह   "आकाश की हद  तक " की समीक्षा [ राधे श्याम त्रिपाठी ]

 "आकाश की हद छूने की कोशिश "

'आकाश की हद तक ' पढ़कर लगा आज का रचनाकार प्राचीन - अर्वाचीन के मध्य द्वन्द्वों से जूझता अपना पथ स्वयं प्रशस्त कर रहा है | संग्रह की कविताओं में भरपूर रस की पुष्टि हुई है| छंद तो अपने आप बोल रहे हैं | अलंकार की बात ही निराली है , रूपक ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया है | नए उपमान गढ़े गए हैं परन्तु पुराने से पीछा भी नहीं छुड़ाया गया है | वही द्रोण , धृतराष्ट्र , दुर्योधन , राम , कृष्ण , हनुमान , बुद्ध , गाँधी , राम अपनी - अपनी विशेष भूमिका में  दिखाई दे रहे हैं |
                                                                  इस रचना संग्रह में हमें समस्याओं  के प्रति छटपटाहट की गंध ही नहीं अपितु विद्रोही स्वर की भी अनुगूँज सुनाई दे रही है | नीलम ने जो देखा , जैसा देखा उस पर कलम बड़ी बेबाकी से चल पड़ी है | संसद से सड़क तक दृष्टि गई है राजनीति तो दुर्योधनों की दासी बनकर रह गई है | समाज कदाचार का कारखाना बन चुका है | धर्म प्रदूषित हो चुका है | पर्यावरण और जीवन से खिलवाड़ हो रहा है | भला ऐसी सामाजिक संरचना में कोई भी कलम का सिपाही क्या उगलेगा केवल शोले ही तो ?
                                                                  नीलम की रचनाओं में जहाँ एक ओर दीन - दलितों को उठाने की चीख - पुकार सुनाई दे रही है , वहीँ दूसरी ओर उसका सशक्त व्यक्तित्व भविष्य के प्रति आस्थावान एवं आशावान दिखाई दे रहा है | जहाँ नीलम ने मरे हुए समाज का अच्छा पोस्टमार्टम किया है वहीं उसकी धमनियों में नए रक्त संचार की क्षमता भी पैदा की है कल्पना के सहारे धरती - आकाश की दूरी  को ह्रदय के  ' टेप ' से नापकर ससीम कर दिया है | यही है वह धारा जिसमें कविता मुखरित होती है | यही है वह भाव - प्रवणता जो किसी कवि - लेखक को शोषितों का मसीहा घोषित कर देती है | नीलम की कविता में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग ' स्व ' को जिस प्रकार उजागर करता है वह अनागत के लिए इतिहास बन सकता है | इस संग्रह की कविताओं में आज के समाज का समग्र चित्र सिने - रील की तरह घूमता दृष्टिगोचर होता है |
                                                                     रचना धर्मी अपनी परिस्थिति , परिवेश और वातावरण से चोट खाकर वियोगी के आँसू की तरह अपनी कविता को बहा देता है ताकि लोग पढ़ें , समझें और अनुभव करें | भले - बुरे का विवेक तो मनुष्य में होता ही है भले ही वह उसपर पर्दा डाल दे | परिवार का स्वरुप ' छः लोगों का घर ' बड़ा ही प्रेरक है , जीवन की सच्चाई से जुड़ा है | ' बेटियाँ ' , ' बच्चे ' , ' घर ' इत्यादि में सत्य के दर्शन होते हैं | भ्रूण - हत्या पर आक्रोश स्वाभाविक है - " माँ ! भ्रूण - हत्या तो बेटों की होनी चाहिए फिर बेटियों को यह सजा क्यों दिलवाती हो ? " यह बड़ी मार्मिक , कारुणिक एवं जानदार पंक्ति है , रुग्ण मानसिकता पर कुठाराघात  है |
                                                                    रचना जब अपने मूल परिवेश से निकलती है तो मन को छू जाती है क्योंकि अपनी माटी की सोंधी गंध का स्वाद ही कुछ अलग सा होता है | " सावन सूखे खेतों में नहीं संसद में बरसता है " , " किसने रेहन रख दिया मेरा खूबसूरत सा गाँव ? " , " पुरवा ! जब मेरे देश जाना मेरी चन्दन माटी की गंध अपनी साँसों में भर लेना   "  ऐसी अभिव्यक्ति देनेवाली पंक्तियाँ हैं कि आज कार्पोरेट जगत से जुड़े लोग शायद ही इसकी अर्थवत्ता का मूल्यांकन कर सकें | " पर यही गाँठ जब पड़ जाती है  कोमल रिश्तों के बीच तो दर्द का सबब बन जाती है , ज़िन्दगी बेअदब बन जाती है " इसमें गाँठ की अनूठी व्याख्या है | यह सामाजिक सन्दर्भों की चुभन को दर्शाती है |
                                                                      " सुनो मनु !  तुम उसका इतिहास क्या रचोगे जिसने खुद तुम्हें रचा है ? " आज मनु महाराज होते तो अपने ऊपर यह टिप्पड़ी   देखकर अवाक रह जाते | उनका दंभ चूर - चूर हो जाता , लज्जा से मुख विवर्ण हो जाता | " माँ के लिए " संवेदनात्मक लय की अनुगूँज है , तुकांत और गेय कविता है | " तुलसी को अप्रासंगिक लगती है रामायण , क्योंकि राम और हनुमान ने बना लीं हैं अलग पार्टियाँ " करारा व्यंग्य है | सचमुच खेत खलिहान से निकलकर कविता कैसे " आकाश की हद तक " जाती है यह संग्रह इसका गवाह है | इसमें ऊर्ध्वगामी जिजीविषा की झलक मिलती है |

2 comments:

  1. दीदी जी, अभिवादन,

    काफी अच्छी समीक्षा है किन्तु सच तो ये है की आपकी कविताओं के भाव को किसी समीक्षा मे बांध पाना संभव ही नहीं | आकाश की हद भी कवियित्री के कलम के पहुँच के दायरे से कम ही है |
    आदरणीय श्री राधे श्याम त्रिपाठी जी इस ललित विवेचना के लिए बधाई के पात्र हैं ......और आप अपनी गहरी और पैनी अंतर्दृष्टि के लिए |
    धन्यवाद एवं बधाई |

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  2. मुझे भी ख़ुशी हुई दीदी कि मुझे भी वह कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ जिसे परम आदरणीय श्री राधे श्याम त्रिपाठी जी द्वारा निष्पादित किया गया| साथ ही मनोज भाई के सार्थक योगदान को भी मैं नहीं भुला सकता जिन्होंने मेरी लाज रखने के लिए एक प्रयास किया| वास्तव में धरती के गर्भ से लेकर के 'आकाश की हद तक' कैसे पहुंचा जाता है अथवा कैसे पहुंचना है यह तो आपका काव्य संग्रह निश्चय ही साकार कर देता है|
    सादर चरण स्पर्श सहित,

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