Friday, 2 September 2011

मैं भी जीना चाहती हूँ.

ये धारदार औजार
काट रहे हैं मुझे
अलग हो रहा है
मेरे जिस्म का एक - एक टुकड़ा
बहुत दर्द हो रहा है माँ !
ये किस गुनाह  की सजा 
दे रही हो  मुझे इसतरह ?
अगर बेटी होना अपराध है
तो क्यों नहीं तुमने
यह सजा खुद को दी?
मेरे अंकुरित होने पर
तुम तो बड़ी खुश थी
एक मशीन तुम्हारे गर्भ पर घूमी
और मैं पल भर में अवांक्षित बन गयी
छटपटा रही हूँ मैं पीड़ा से
दम घुट रहा है मेरा
खो रही हूँ अपना अस्तित्व
माँ होकर कैसा उपहार
दे रही हो मुझे
छीन रही हो मुझसे मेरा जीवन
मैं भी देखना चाहती हूँ
ज़िन्दगी के रंग 
सुनना चाहती  हूँ ज़िन्दगी की धुन
पलना चाहती हूँ
तुम्हारे आँचल की छाया में
खेलना चाहती हूँ तुम्हारी गोद में
भैया की तरह
क्यों नहीं पहुँच रही है
तुम तक मेरी आवाज ?
मैं भी जीना चाहती हूँ
क्या जीने का हक ,  मुझे दोगी माँ ?