Saturday, 2 July 2011

गठरी वाली औरतें

उनकी आँखों में
हँसता है भादो का आसमान
और साँसों में धान की दूधिया महक
बरगद के बरोह जैसी बांहों में
ब्रह्माण्ड  उठाये
अपने खुरदुरे पैरों से
धरती को गुदगुदाते
भीड़ भरी रेल में
बैठने की जगह बनाते
हँसते - खिलखिलाते
वे खोलती हैं अपनी गठरियाँ
और रोटियों के साथ
निगल जाती हैं समूचा दर्द
उनके जिस्म के सितार पर
बजती रहती है ज़िन्दगी की धुन 
उनके पसीने से आती है लोहे की गंध 
और शब्दों के धार से चीर देती हैं 
किसी का भी कलेजा 
अपने आँचल में बाँधकर
चटख रंगों वाले सपने 
वे खिल जाया करती हैं 
गर्मियों में गुलमोहर की तरह 
गठरी वाली औरतें महकती हैं 
कभी नागफनी , कभी गुलाब की तरह | 

 

3 comments:

  1. इस कविता की प्रशंसा के लिए मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे| निरुत्तर करने के लिए आपका आभारी हूँ|

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  2. यह कविता बस कविता सी है।
    इसकी तुलना कविता ही है॥
    गठरी वाली भारत माता का भारत मेँ शुभ दर्शन है।
    पहले जग क्रन्दन करता था अब भारत करता क्रन्दन है॥यह कविता बस कविता सी है।
    इसकी तुलना कविता ही है॥
    गठरी वाली भारत माता का भारत मेँ शुभ दर्शन है।
    पहले जग क्रन्दन करता

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  3. ऐसी संवेदना हीं किसी रचनाकार को सामान्य से विशिष्ट बना देती है | अग्रज वाहिद के समान मै भी निरुत्तर हूँ |

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