Saturday, 2 July 2011

अरे यायावर रहेगा याद ! [जलदापारा फ़ॉरेस्ट ]

वन की सुरम्य पगडंडियों से गुजरते हुए अनुभव हो रहा था कि एक पावन सुगंध वातावरण को सुरभित किये हुए है ठीक वैसे ही जैसे यज्ञ - कुण्ड से उठती महक मन -प्राण में रच - बस जाती है | वैदिक ऋचाओं सा गूँज रहा था वन का मधुर  संगीत ! पत्तों , किसलयों ,फलों - फूलों की महक मन को विभोर कर रही थी |
                                          संध्या का साँवला आँचल लहरा रहा था | आकाश का जादू देखने लायक था | नीले , पीले , गुलाबी , लाल , हरे , सुनहले रंगों के सरोवर में आकाश डुबकियाँ लगा रहा था | उस रंगीन सरोवर से नहाकर निकलते बादल सद्यः स्नात शिशुओं की तरह प्रतीत हो रहे थे | पक्षियों का कलरव वातावरण की निस्तब्धता को भंग  कर रहा था | वे अपने बसेरे को लौट  आये थे , शाखाओं पर अपनी जगह बनाने को अस्थिर हो रहे थे |
                              हम   घने वन के बीच प्रकृति के बिलकुल करीब थे , इतने निकट कि उसकी साँसों की अनुगूँज सुनाई पड़ रही थी जैसे माँ के वक्ष से लिपटे होने पर उसकी साँसों का स्पंदन सुनाई देता है | मन स्निग्ध भावनाओं के निर्झर में नहाने लगा ,होठों से फूटने लगे प्रार्थना के अस्फुट स्वर - ' विधाता ! हमें सदबुद्धि दो कि छाया देने वाले प्रकृति के आँचल को हम तार - तार न करें | ' आगे बढ़ते समय कुछ वन्य जीवों के दर्शन का सुयोग भी मिल रहा था | उस दिन हम शायद शुभ मुहूर्त में निकले थे | हरी झाड़ियों के बीच से निकलकर एक सुन्दर हिरण हमारे रास्ते के बिलकुल पास खड़ा हो गया ,हमने गाड़ी रोक दी ,वह शायद जड़ और हतप्रभ था , हिल भी नहीं रहा था | हमें भी उस भीतु प्राणि के इस व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा था | हमने जी भरकर उसकी तस्वीरें लीं ,वह लगभग पाँच मिनट तक वहीँ खड़ा रहा | गाड़ी स्टार्ट करने पर आवाज़ सुनकर भागा | थोड़ी दूर जाने पर जंगली भैंसों का एक झुण्ड मिला | सेनानायक ने हमें रुक जाने की चेतावनी दी | वह विशालकाय था प्रायः हाथी जैसा लम्बा -चौड़ा | रास्ते के बीचों - बीच खड़ा वह अपने साथियों को रास्ता पार करा रहा था और लगातार हम पर नज़रें रखे हुए था | गाड़ी की खिड़कियों के शीशे चढ़ाकर हम दम साधे बैठे हुए थे |रेंजर बता रहा था कि यदि यह आक्रामक हो जाय और हमारी तरफ पलट जाय तो बचना मुश्किल है | जंगली भैंसों के आक्रमण के कई किस्से उसने हमें बताये | जब वह चला गया तब हम आगे बढ़े | साम्भर  हिरण , बारहसिंघा ,जंगली सूअर और तरह -तरह के पशु - पक्षियों का अवलोकन करते जब हम हालाँग नदी के जल सतह पर पड़ती सूर्य की स्वर्ण - रश्मियों का नर्तन देखने लगे तभी दृष्टि समीप के एक वृक्ष पर पड़ी जिसकी शाखाओं पर सैकड़ों मोर -मोरनी बैठे हुए थे | ऐसा दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था |
                                    तोरसा नदी पार कर हम जिस जगह पहुँचे वहाँ हाथियों का झुण्ड मस्ती में झूम रहा था | कुछ के बच्चे भी उनके साथ थे | वन अधिकारी ओमप्रकाश ने उनके विषय में काफी जानकारियाँ दीं | शाम ढल रही थी और रात आने को थी | वन के सुरक्षा कर्मी पेट्रोलिंग के लिए निकल पड़े थे | मस्त गैंडे अपनी साम्राज्य सीमा में विहार करते नज़र आये | जलदापारा फ़ॉरेस्ट वैसे भी गैंडों के लिए ही  प्रसिद्ध है | चारो तरफ अँधेरा फैला हुआ था | हम तोरसा नदी के किनारे खड़े उसकी लहरों का संगीत सुन रहे थे | वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था | ड्राईवर प्रशांत ने कहा रात होने से पहले हम लौट चलें तो बेहतर होगा | मन मारकर हम वापस लौट पड़े | अँधेरा गहरा रहा था , अचानक प्रशांत ने कहा -' वो देखिये ! ' उसके इशारे पर हमने देखा एक हिरण एक गिरे हुए वृक्ष के तने पर बैठा हुआ था | आगे जाने पर वह जंगली भैंसा भी वापस दिख गया शायद वह टोह ले रहा था कि उसके क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश करनेवाले हम घुसपैठिये बाहर निकले कि नहीं |
                                            जंगल के बीच बने वाच टावर पर चढ़कर हमने वन के सौंदर्य को मन -प्राण भर निहारा | आकाश का सौंदर्य बदल चुका था | उसके काले फलक पर बिखरा सिन्दूरी रंग देख लग रहा था हम किसी परीलोक  में विहार कर रहे हैं | ड्राईवर ने खिड़कियों के शीशे ऊपर चढ़ा लेने को कहा क्योंकि खतरा हो सकता था और हम थे कि हाथ बाहर निकालकर तस्वीरें ले रहे थे | जी कर रहा था इस समूचे सौंदर्य को कैमरे में कैद कर लें | सुरेश नाराज हो रहे थे - ' तुम तो आकाश और बादलों को देख पागल हो जाती हो | ' बच्चे भी मना कर रहे थे | बुझे मन से मैंने सबकी भावनाओं का सम्मान करते हुए कैमरा रख दिया पर खिड़की खुली रही | मैं उस हवा को वन - गंध को छोड़ना नहीं चाहती थी | हमने और सोनू ने लगभग सात सौ तस्वीरें उतारी थीं | सब चिढ़ा रहे थे -' ये लोग भावी फोटोग्राफर हैं , इनके फोटो की प्रदर्शनी लगेगी | 'हम मुस्कुराते रहे |
                                                                दूसरे दिन सुबह पर्यटकों के शोर शराबे से नींद खुली तो खिड़की से देखा एक गैंडा रेस्ट हॉउस के बिलकुल करीब आ गया था वह पास के मैदान में रखे हुए नमक को खाने आया था जो वन - विभाग के कर्मचारियों ने रखा था | शहरी लोग उसे देखकर पागल हुए जा रहे थे | सुरेश ने उसकी बीसों तस्वीरें उतारीं और उसके क्रिया कलापों की देर तक रिकार्डिंग की | मैंने चुटकी लेते हुए कहा - ' क्यों जनाब ! मैं तो बादलों की बेटी हूँ पर आप कबसे गैंडा प्रेमी हो गए ? ' वे बोले अरे यार ! क्या मस्त अदाएँ है उसकी , देखो , देखो | हम सब ठहाका मारकर हँस पड़े | इस स्थान को कई बार देख चुकी हूँ ,परन्तु मन नहीं भरता जी चाहता है इसके सौंदर्य को ह्रदय में सदा के लिए बसा लूँ |

No comments:

Post a Comment