Saturday, 11 August 2012

रोटियों की खातिर

रोटी तो वहां भी थी
था नमक और प्याज भी
जिसे हथेलियों से फोड़कर
तुम मिर्च के साथ खाया करते थे
तब तुम्हारे सपनों में थे
बादल बरखा और हरे भरे खेत
गांव के डीह पर खड़ा बूढ़ा बरगद
तुमसे जी खोलकर बतियाता था
ऊसर पर उगा कुश भी
तब मखमल जैसा लगता था
और रात जब ओस के मोतियों से
पूरी धरती को सजा दिया करती थी
तो उसकी आभा से दीप्त तुम्हारी आंखों में
लहराने लगती थीं ढेर सारी सुनहली बालियां
तुम्हारी सोच कुछ ऐसी थी
कि अनाज से भरा कोठार
तुम्हें कुबेर का खजाना लगता था
सावन-भादो को पहचानते थे तुम
फागुन तुम्हें गुदगुदाता था
और फिर एक दिन
रोटियों के नाम पर
महत्वाकांक्षाओं के कोहरे से घिरे
तुम भटक गए किसी अनजान दिशा में
तुम्हारे पारदर्शी झूठ के पीछे से
पुकार कर कह रही थीं रोटियां
हे प्रवंचक , मिथ्याभाषी !
दिल पर हाथ रखकर कहो
क्या तुम्हारी लड़ाई वास्तव में
रोटियों की खातिर है
या अपनी रेगिस्तानी हसरतों को
दे दिया है तुमने रोटियों का नाम ?

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