Sunday, 30 October 2011

स्मृतियों के वातायन से

ये १९८९ की बात है , गुरुवर राधेश्याम त्रिपाठी जी से मिलकर मैं  उनके गाँव प्रभुपुर से  बाबूजी के साथ  लौट रही थी | रास्ते में तूफ़ानी हवाएँ चलने लगीं उनका प्रवाह इतना तेज था कि कदम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे | मैंने बाबूजी का हाथ कसकर पकड़ रखा था , डर भी लग रहा था क्योंकि अँधेरा गहरा रहा था तभी बाबूजी ने कहा - " देखो बेटा हम प्रकृति के कितने करीब हैं " मैं सच में प्रकृति के साहचर्य को महसूस करने लगी ,भय कम होने लगा , पता ही नहीं चला कब हमारा अपना गाँव आ गया | आज भी जब कभी ज़िन्दगी में कोई तूफ़ान उठ खड़ा होता है  , उथल - पुथल मच जाती है तो लगता है बाबूजी कह रहे हैं " देखो बेटा हम ज़िन्दगी के कितने करीब हैं " और सच में उन विषम परिस्थितियों में भी मुझे  ज़िन्दगी की धड़कन सुनाई देने लगती है | जीवन के न जाने कितने मोड़ों पर उन्होंने मुझे भटकने से बचाया |  भवानीपुर एडुकेशन सोसाईटी कॉलेज में जब मैं साक्षात्कार देकर आई और मेरा चयन भी हो गया तो वहाँ पहले से पढ़ा रही मेरी सहकर्मियों ने मुझे बहुत डराया | उनमें एक मेरी कॉलेज की प्राध्यापिका भी थीं | उन्होंने कहा - जानती हो , यहाँ स्टुडेंट इतने बदतमीज़ हैं कि उपस्थिति लेते समय कुत्ते बिल्लियों की आवाजें निकालते हैं  , अनर्गल प्रश्न पूछते हैं | मुझे बड़ा अजीब लगा , घर आकर कहा मुझे ऐसे कॉलेज में नहीं पढ़ाना | बाबूजी हँसने लगे पास बुलाकर बैठाया फिर पूछा - क्यों ? क्या तुमको अपने पर विश्वास नहीं ? क्या तुम्हारे पास अपना व्यक्तित्व नहीं ? या  अपने विषय पर अधिकार नहीं ? कमजोर और डरपोक हो ? मैं चुप ! कहा ऐसी कोई बात नहीं | उन्होंने कहा मेरी बेटी होकर डरती हो ?  जाकर क्लास लो कुछ नहीं होगा | दूसरे दिन जब कॉलेज गई तो बी . ए. आनर्स वालों के साथ पहला पीरियड था | देखा मेरे कई विद्यार्थी मुझसे भी बड़े हैं , विचित्र स्थिति थी , मैंने बाबूजी की बातें याद कीं और मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई | बाद में कुछ दूसरे कारणों से मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया | मेरे जीवन के संघर्षमय पलों में वे मेरे लिए रात - रात भर जागे , मैं पढ़ती तो वो मेरे लिए नोट्स तैयार करते | मेरे दादाजी लड़कियों की पढ़ाई के ख़िलाफ थे | जब मैंने हाईस्कूल की परीक्षा पाँच में से तीन विषयों में विशेष योग्यता के साथ पास किया तो सोचा दादाजी पिघल जायेंगे पर वो अड़ गए | मेरा दाखिला नहीं करवाया , माँ की उनके सामने कुछ चलती नहीं थी और बाबूजी कलकत्ता थे | मैं उन्हें हर दूसरे दिन चिट्ठी लिख -  लिखकर भेजती वो  आकर सब ठीककर देनेका आश्वासन देते |आखिरकार मेरे प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं
बाबूजी दशहरे के अवसर पर गाँव आये तो मेरा रोना - धोना शुरू हुआ कि मुझे हर हाल में पढ़ना है | वे उसी दिन धरांव इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य  चंद्रदेव चौबे जी से मिले और उनसे दाखिले  के लिए अनुरोध किया पर उन्होंने कहा की काफी देर हो चुकी है रजिस्ट्रेशन भी हो गया है अब कुछ नहीं हो सकता | बाबूजी ने   कहा  कोई  रास्ता   बताइए  यह   किसी  बच्ची  की  ज़िन्दगी  का  सवाल  है |      चौबेजी   ने कहा ठीक है आप इलाहाबाद बोर्ड से अनुमति ले आइये मैं दाखिला कर लूँगा | बाबूजी ने दौड़ भाग करके बोर्ड से अनुमति प्राप्त कर ली | ग्यारहवीं कक्षा में मेरा दाखिला हो गया , मेरे कक्षाध्यापक थे पंडित राधेश्याम त्रिपाठी जी | सब कुछ ठीक हुआ तो दादा जी ने दूसरी मुसीबत खड़ी कर दी कि मैं इसे विद्यालय नहीं जाने दूँगा क्योंकि वो कोएड स्कूल है | बाबूजी को समझ में नहीं आ रहा था क्या करें , वो मेरे लिए नौकरी छोड़कर घर बैठ नहीं सकते थे और उनके न रहने पर किसकी हिम्मत थी जो मुझे स्कूल भेजता | थक हार कर वो मेरे गुरूजी पंडित राधेशयाम त्रिपाठी जी की शरण में गए और उन्हें सारी कहानी बताई | वो दादाजी को बखूबी जानते थे | उन्होंने हर संभव सहायता का आश्वासन दिया | दादाजी और बाबूजी में समझौता यह हुआ कि मैं पढ़ाई घर पर ही करुँगी और विद्यालय सिर्फ परीक्षा देने जाऊँगी |  मजबूरन मुझे भी उनका यह  निर्णय स्वीकार करना पड़ा , मरता क्या न करता | उस समय बाबूजी ने मेरे लिए जो संघर्ष किया वह आजीवन याद रहेगा | नीलकमल की परीक्षा जल्दी हो जाती थी  वो कलकत्ता  में पढता था  | तब बाबूजी उसे गाँव भेज देते थे और वही मुझे परीक्षा दिलाने  कॉलेज साथ लेकर जाता था | कोई अध्यापक नहीं , कोई मार्गदर्शन  करने वाला नहीं , मैं अपनी सहेलियों से नोट्स माँगकर पढ़ती , रात -रात भर उसे लिखती क्योंकि दूसरे दिन उन्हें लौटाना होता था | संघर्ष करते हुए  बारहवीं की परीक्षा पास की | बाबूजी समझ गए कि अब गाँव पर मेरा रहना नहीं हो पायेगा क्योंकि दादा जी पढने देंगे नहीं और मैं पढ़े बिना जी नहीं पाऊँगी | दादा जी से लड़ - भिड़ कर वो मुझे कलकत्ता ले आये जहाँ से मेरे जीवन के दूसरे अनुच्छेद का आरम्भ हुआ |

                                                                      

Friday, 28 October 2011

गज़ल

यूँ सच ने कर दिए हैं कुछ सवाल दोस्तों
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !
गठरी फरेब की है इतनी उन्होंने बाँधी
अंधों के साथ हम भी कहते हैं उनको गाँधी
इतिहास को बदलना फितरत थी जिनकी यारों
वे हो गए हैं बेतरह बेहाल दोस्तों !
गूँगों की जीभ  पर भी अब शब्द मचलते हैं
नंगे भी सुबह शाम रोज वस्त्र बदलते हैं
चारो  तरफ उगे थे जंगल जो अंधेरों के
कटने पे  उनको हो रहा मलाल दोस्तों !
उतरे हैं कुछ मुखौटे चेहरे से खुदाओं के
कोई न रीझता है अब उनकी अदाओं से
मछली नहीं है कोई , खाली है समंदर भी
बैठे लाचार लेके अपना जाल दोस्तों !
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !

तुम्हारे नाम

मैंने समूची धरती 
कर दी है तुम्हारे नाम 
नहीं खींच सकता कोई भी 
तुम्हारे पैरों तले की जमीन |
आकाश कर दिया है
तुम्हारी आँखों के नाम
तुम्हारे स्वप्न उन्मुक्त विचर सकें |
हिमालय किया है
तुम्हारे कंधों के नाम
वहन कर सको हर भार !
कंटकित गुलाब है
तुम्हारे होठों के नाम
दर्द में भी मुस्कुरा सको |
नक्षत्रों से भरा नभ मंडल
सौंपा है तुम्हें
 कि लड़ सको अँधेरे से |
सारी नदियाँ , सारे समुद्र
तुम्हारे हिस्से हैं  
जीवन नहीं बनेगा मरुभूमि |
सुनो !
मैंने बाँध दिया है तुम्हारे सीने पर
अपने आशीष का कवच ,
नहीं छू पायेगा  तुम्हें कोई आघात |


Wednesday, 19 October 2011

आकाश की हद तक { कविता संग्रह } नीलम सिंह

वागर्थ अक्टूबर २०११ में प्रकाशित नीलम सिंह के कविता संग्रह   "आकाश की हद  तक " की समीक्षा [ राधे श्याम त्रिपाठी ]

 "आकाश की हद छूने की कोशिश "

'आकाश की हद तक ' पढ़कर लगा आज का रचनाकार प्राचीन - अर्वाचीन के मध्य द्वन्द्वों से जूझता अपना पथ स्वयं प्रशस्त कर रहा है | संग्रह की कविताओं में भरपूर रस की पुष्टि हुई है| छंद तो अपने आप बोल रहे हैं | अलंकार की बात ही निराली है , रूपक ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया है | नए उपमान गढ़े गए हैं परन्तु पुराने से पीछा भी नहीं छुड़ाया गया है | वही द्रोण , धृतराष्ट्र , दुर्योधन , राम , कृष्ण , हनुमान , बुद्ध , गाँधी , राम अपनी - अपनी विशेष भूमिका में  दिखाई दे रहे हैं |
                                                                  इस रचना संग्रह में हमें समस्याओं  के प्रति छटपटाहट की गंध ही नहीं अपितु विद्रोही स्वर की भी अनुगूँज सुनाई दे रही है | नीलम ने जो देखा , जैसा देखा उस पर कलम बड़ी बेबाकी से चल पड़ी है | संसद से सड़क तक दृष्टि गई है राजनीति तो दुर्योधनों की दासी बनकर रह गई है | समाज कदाचार का कारखाना बन चुका है | धर्म प्रदूषित हो चुका है | पर्यावरण और जीवन से खिलवाड़ हो रहा है | भला ऐसी सामाजिक संरचना में कोई भी कलम का सिपाही क्या उगलेगा केवल शोले ही तो ?
                                                                  नीलम की रचनाओं में जहाँ एक ओर दीन - दलितों को उठाने की चीख - पुकार सुनाई दे रही है , वहीँ दूसरी ओर उसका सशक्त व्यक्तित्व भविष्य के प्रति आस्थावान एवं आशावान दिखाई दे रहा है | जहाँ नीलम ने मरे हुए समाज का अच्छा पोस्टमार्टम किया है वहीं उसकी धमनियों में नए रक्त संचार की क्षमता भी पैदा की है कल्पना के सहारे धरती - आकाश की दूरी  को ह्रदय के  ' टेप ' से नापकर ससीम कर दिया है | यही है वह धारा जिसमें कविता मुखरित होती है | यही है वह भाव - प्रवणता जो किसी कवि - लेखक को शोषितों का मसीहा घोषित कर देती है | नीलम की कविता में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग ' स्व ' को जिस प्रकार उजागर करता है वह अनागत के लिए इतिहास बन सकता है | इस संग्रह की कविताओं में आज के समाज का समग्र चित्र सिने - रील की तरह घूमता दृष्टिगोचर होता है |
                                                                     रचना धर्मी अपनी परिस्थिति , परिवेश और वातावरण से चोट खाकर वियोगी के आँसू की तरह अपनी कविता को बहा देता है ताकि लोग पढ़ें , समझें और अनुभव करें | भले - बुरे का विवेक तो मनुष्य में होता ही है भले ही वह उसपर पर्दा डाल दे | परिवार का स्वरुप ' छः लोगों का घर ' बड़ा ही प्रेरक है , जीवन की सच्चाई से जुड़ा है | ' बेटियाँ ' , ' बच्चे ' , ' घर ' इत्यादि में सत्य के दर्शन होते हैं | भ्रूण - हत्या पर आक्रोश स्वाभाविक है - " माँ ! भ्रूण - हत्या तो बेटों की होनी चाहिए फिर बेटियों को यह सजा क्यों दिलवाती हो ? " यह बड़ी मार्मिक , कारुणिक एवं जानदार पंक्ति है , रुग्ण मानसिकता पर कुठाराघात  है |
                                                                    रचना जब अपने मूल परिवेश से निकलती है तो मन को छू जाती है क्योंकि अपनी माटी की सोंधी गंध का स्वाद ही कुछ अलग सा होता है | " सावन सूखे खेतों में नहीं संसद में बरसता है " , " किसने रेहन रख दिया मेरा खूबसूरत सा गाँव ? " , " पुरवा ! जब मेरे देश जाना मेरी चन्दन माटी की गंध अपनी साँसों में भर लेना   "  ऐसी अभिव्यक्ति देनेवाली पंक्तियाँ हैं कि आज कार्पोरेट जगत से जुड़े लोग शायद ही इसकी अर्थवत्ता का मूल्यांकन कर सकें | " पर यही गाँठ जब पड़ जाती है  कोमल रिश्तों के बीच तो दर्द का सबब बन जाती है , ज़िन्दगी बेअदब बन जाती है " इसमें गाँठ की अनूठी व्याख्या है | यह सामाजिक सन्दर्भों की चुभन को दर्शाती है |
                                                                      " सुनो मनु !  तुम उसका इतिहास क्या रचोगे जिसने खुद तुम्हें रचा है ? " आज मनु महाराज होते तो अपने ऊपर यह टिप्पड़ी   देखकर अवाक रह जाते | उनका दंभ चूर - चूर हो जाता , लज्जा से मुख विवर्ण हो जाता | " माँ के लिए " संवेदनात्मक लय की अनुगूँज है , तुकांत और गेय कविता है | " तुलसी को अप्रासंगिक लगती है रामायण , क्योंकि राम और हनुमान ने बना लीं हैं अलग पार्टियाँ " करारा व्यंग्य है | सचमुच खेत खलिहान से निकलकर कविता कैसे " आकाश की हद तक " जाती है यह संग्रह इसका गवाह है | इसमें ऊर्ध्वगामी जिजीविषा की झलक मिलती है |

Tuesday, 18 October 2011

इस बार ...

इस बार
सर्दी की छुट्टियों में
ठण्ड से काँपती गंगा की लहरों को
उढ़ाऊँगी स्नेह का दुशाला
घाटों से पूछूँगी हाल - चाल
मंदिर की घंटियों में सुनूँगी
संस्कृति की झंकार
चंदनी माटी को चूमूँगी
गले मिलूँगी आम के पेड़ से
तालाब में पत्थर फेंककर
जगाऊँगी सोई मछलियों को
कोहरे की चादर में लिपटे
खेत - खलिहानों से करूँगी भेंट अंकवार
मिटटी के चूल्हे से फूटती 
पकते अनाज की खुशबू से 
भरूँगी मन - प्राण 
आँगन में खिले गुलाब को 
चौंका दूँगी चुटकियाँ बजाकर 
इस बार 
माँ की गोद से माँग लूँगी
आँख भर नींद , पलक भर सपना 
थोड़ी मनुहार , थोडा दुलार 
अंतस के सागर से एक बूँद प्यार !