Thursday, 9 June 2011

तुम्हें कसम है धरती की ...

संधि ,सभा ,समझौते छोड़ो उठ जाओ
उलझ रहे हो क्यों बेमानी बातों में
बिता दिया सुबहों को तुमने सोने में
ढूँढ रहे सूरज अँधेरी रातों में
चोर -चोर  मौसेरे भाई होते हैं
मरने पर हँसते , जीने पर रोते हैं
इनकी फितरत समझ न पाएंगे हम - तुम
जादू है इनके मायावी  हाथों में |
छल ,प्रवंचना में ,धोखे में मत आओ
दर्द भरा है इन मीठे आघातों में
भ्रष्ट तंत्र के भ्रष्ट दरिन्दे बेच रहे
अपनी माँओं को , माँ जैसी माटी को
कहो बादलों से  गरजें , बरसें , टूटें
करदें बारूदी अपनी हर घाटी को
तुम्हें कसम है धरती की , सोओ मत ,जग जाओ
क्या रखा है किन्नर की बारातों में |

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