Friday, 24 June 2011

धानी चूनर ओढ़े धरती झूम रही होगी , बरखा रानी के घुँघरू बज रहे होंगे ,खिलखिलाकर हँस रही होंगी गीली राहें , झिंगुरों की झनकार कानों में मधुरस घोल रही होगी ,मनचला आकाश अल्हड़ हवाओं से छेड़ -छाड़  कर रहा होगा , अपने बगीचे में गूँज रहा होगा एक मृदु मर्मर संगीत , नटखट बच्चे भींगते हुए पानी में कागज़ की नौकाएं तैरा रहे होंगे ,सबकुछ तो वही होगा , सिर्फ मैं वहाँ नहीं हूँ |

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