Wednesday, 25 January 2012

माँ की आँखें

कभी भोर की पहली किरण सी ,
कभी गंगा की फेनिल लहरों सी
 माँ की आँखें लगती हैं
एक गहरी झील सी
जिसमें तैरते हैं ढेर सारे
सपनों के खूबसूरत कमल ।
आषाढ़ की पहली बरखा सी
मिटटी के दीप्त नन्हे दिए सी
किसी शिशु की मासूम हँसी की तरह
खिलखिलाती हैं और बिखेर देती हैं
गंधराज की खुशबू चारो तरफ ।
उन आँखों में दीखते हैं
ज़िन्दगी के हर रंग
सृष्टि का सारा सौंदर्य
फीका है उनके  सामने
उन आँखों में लहराते हैं 
वेदों , उपनिषदों ,गीता , रामायण के अक्स 
माँ की आँखों की गंगोत्री से 
निकलती है स्नेह की गंगा 
दीखती हैं उनमें हिमालय की 
अनंत श्रृंखलाएँ , उपत्यकाएँ
उन चमकती आँखों में दीखती हैं 
सारे उज्जवल नक्षत्रों की छायाएँ ।