Tuesday, 8 July 2014

और वह पहाड़ बन गई …..



जब - जब तुमने  उसे रौंदना  चाहा धरती की तरह
वह  ऊपर उठी और आसमान बन गई
उसकी आँखों  में उगने लगे सपनों के इंद्रधनुष |
उसकी दृष्टि में तुमने उतार देना चाहा गहरा अँधेरा
 और वह खिलकर सुनहली  धूप  बन गई |
तुम बनाना चाहते थे उसे समतल खेत
कि उगा सको उसमें मनचाही फसलें
और वह पहाड़ बन गई |
तुमने उसे बनाना चाहा एक क्षीण रेखा जैसी नदी
कि सींचती रहे वह तुम्हारे भीतर का मरुस्थल

और वह समुद्र बन गई

Thursday, 3 July 2014

बारिश

बारिश ! एक खूबसूरत एहसास ! याद आती हैं गीली पगडंडियाँ , करौंदे , मेंहदी , सफ़ेद कुंइयाँ ,कमल के गुलाबी फूल , धान के खेत , झूले , कजरी , बूँदों के छल्ले , डगमगाती नाव , गंगा का मटमैला आँचल और माँ की आँखों के इंद्रधनुष ! बाबूजी की बाँहों का बरगद और उसके पत्तों से छन- छन कर गिरती वात्सल्य की बूँदे ! 
                                                                                                
  
बारिश जैसे ख्वाबों की दुनिया में लौटना , बारिश जैसे हथेलियों पर मोतियों का चमकना ,
बारिश जैसे मन के  काश में बादलों का घिरना ....