Tuesday, 4 August 2015

सपने कभी मरते नहीं




अभी-  अभी हिमालय के उन्नत शिखरों पर
उन्हें देखा है मैंने सफ़ेद बादलों के बीच
सूरज की सुनहली किरणों से
बरस रहा था उनका नूर
गंगा - यमुना की लहरों में  
गूँज रहा था उनकी साँसों का संगीत
पारिजात के ताजा फूलों से   
झाँक रहा था उनका मुस्कराता चेहरा
मासूम बच्चों के होठों पर
चमक रहे थे वे दूधिया हँसी की तरह
युवाओं  के जोश में , उमंगों में
उनकी  महत्वाकांक्षाओं में ,
उनके संकल्पों में ,उनके सपनों में ,
वे दिख रहे हैं मुझे बार - बार
और सपने कभी मरते नहीं
कलाम ! हमारे दिलों में
धड़कते रहेंगे एक ख्वाब बनकर
मानवता जब तक ज़िंदा रहेगी ,
ज़िंदा रहेंगे कलाम भी  



Sunday, 15 March 2015

वह वृक्ष हँसता है




एक दिन उग आया वह मेरे भीतर
अपनी छतनार डालियों के साथ
नेह के नीर ने सींचा उसे
ममता की माटी ने पोषित किया
नर्म धूप ने स्निग्ध किया
शीतल हवा ने चैतन्य |
वात्सल्य भरी आँखें निहारती रहीं
इस तरह वह फैला , फूला और फला
कामना के कोमल किसलयों
संवेदना की रस भरी मंजरियों
और विश्वास के फलों से सजा |
उसकी छाया में
जीवन का हर ताप हिमखंड बना
और पीड़ा चन्दन
उसके फूलों में हँसता है वसंत
और पत्तों में सावन
आकाश जब उसके माथे को चूमता है
भोर लगाती है लाल टीका ,
उसकी जड़ों को जब पृथ्वी गुदगुदाती है
वह वृक्ष हँसता है
हँसता है जीवन उसके साथ
जीवन की मधुरिमा संगीत बनकर
कोकिल के स्वरों में गूँजती है
मेरे भीतर का पातझड़ बन जाता है मधुमास

वह वृक्ष हँसता है |