Sunday, 24 July 2011

पानी

आकाश से बरसकर
धरती से ख़ुशबू बनकर फूटता
चट्टान के सीने को फोड़कर
आवेग में प्रवाहित
नदी - तालाब के वक्ष पर
शिशु की तरह मचलता
किसी की आँखों में
विद्युत् की तरह चमकता
हरीतिमा के बीच
रजत धारा सा बहता
यौवन के उद्दाम आवेग में
समुद्र बनकर गरजता
अल्हड़ प्रेमी की तरह
झरना बन गुनगुनाता
पानी हमेशा सुन्दर लगता है |
किसी पहाड़ के गले में बाहें डाल
उसके कानों में कुछ कहता है
या अपनी नर्म अँगुलियों से
पृथ्वी के खुरदरे होठों को छूकर
नाज़ुक बना देता है
उसकी हथेलियों पर
मेंहदी बनकर उभरता है
तब पानी प्यार की तरह
मधुमय लगता है
पर किसी भूखे बच्चे के कटोरे में
जब दूध की तरह छलकता है
पानी मुझे सबसे सुन्दर लगता है |

No comments:

Post a Comment