Tuesday, 18 October 2011

इस बार ...

इस बार
सर्दी की छुट्टियों में
ठण्ड से काँपती गंगा की लहरों को
उढ़ाऊँगी स्नेह का दुशाला
घाटों से पूछूँगी हाल - चाल
मंदिर की घंटियों में सुनूँगी
संस्कृति की झंकार
चंदनी माटी को चूमूँगी
गले मिलूँगी आम के पेड़ से
तालाब में पत्थर फेंककर
जगाऊँगी सोई मछलियों को
कोहरे की चादर में लिपटे
खेत - खलिहानों से करूँगी भेंट अंकवार
मिटटी के चूल्हे से फूटती 
पकते अनाज की खुशबू से 
भरूँगी मन - प्राण 
आँगन में खिले गुलाब को 
चौंका दूँगी चुटकियाँ बजाकर 
इस बार 
माँ की गोद से माँग लूँगी
आँख भर नींद , पलक भर सपना 
थोड़ी मनुहार , थोडा दुलार 
अंतस के सागर से एक बूँद प्यार !

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