Monday, 1 December 2014

माँ के लिए-








तुम्हारे स्नेह का निर्झर , तुम्हारा दूधिया आँचल
तुम्हारी भावना कोमल तुम्हारी साधना निश्छल
 मुझे तारों की छाया में भी हर पल याद आती है
ये आँखें मुस्कुराती हैं ।
ये ममता जब तुम्हारी लोरियाँ मीठी सुनाती  है
तरन्नुम से तुम्हारे मौत को भी नींद आती है
तुम्हारी वेदना होठों पे मेरे गुनगुनाती है
ये आँखें मुस्कुराती हैं ।
तुम्हीं ने आँख की बारिश में सावन को बुलाया था
पुराने नीम पर झूला मेरी खातिर लगाया था
वो सपनों का हिंडोला आज भी ख्वाबो में आता है
ये आँखें मुस्कुराती हैं ।
वो परियों की कहानी और बातें चाँद तारों की
तुम्हारी साँस  में बसती थी खुशबू वो बहारों की
हमारी आँख के जुगनू , तुम्हारी आँख का काजल
हमारे मन की माटी और तुम्हारे प्यार का बादल
तुम्हारी दी हुई चूड़ी , तुम्हारी दी हुई बिंदिया
वो कजरौटा तुम्हारा और तुम्हारी दी हुई गुड़िया
वो सौगातें मोहब्बत की मुझे फिर याद आती हैं
ये आँखें मुस्कुराती हैं । 

Tuesday, 2 September 2014


हमें शर्म क्यों नहीं आती ?



 




जिस यूनियन जैक को उतारने के लिए हमारे शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी उसे सीने पर चिपकाकर शान से घूमने वालों पर लानत है । आज गुलामी हिन्दुस्तानियों की रगों में खून की जगह बह रही है ,उन्हें अपना देश ,अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति  यहाँ तक कि अपनी माँ भी पिछड़ी हुई लगती है । ये गुलामी के प्रतीकों को सर पे उठाये घूमते  हैं । इन्हें लगता है कि विदेशी वेशभूषा और तौर तरीके अपनाकर ये अंग्रेज बन जाएँगे पर अफ़सोस कि ये भारतीय मैकाले और कर्ज़न अपना चेहरा नहीं बदल सकते। शायद ये नहीं जानते कि चाहे अपने बाल भले नीले - पीले कर डालें और एक कान में बाली पहन लें या सरकउआ पैंट  पर रहेंगे भारतीय ही । कपड़े तो बदल लोगे जनाब पर इस भारतीय  चेहरे का क्या करोगे ? काश ऐसी ललक तुम्हारे मन में तिरंगे के लिए होती जो यूनियन जैक के लिए है तो तुम्हारा जीवन धन्य हो जाता ।  


Tuesday, 19 August 2014

एक चिट्ठी बनारस के नाम ....




उस शाम दशाश्वमेध घाट पर 
गंगा की लहरों को कुछ दिए समर्पित कर 
एक संधि पत्र लिखा गया था । 
साक्षी थे तुम भी उस अनुबंध के 
बता मेरे बनारस उस रात अपने चरखे पर 
सपनों के कितने सूत काते थे तुमने 
और ताने भरनी पर कितनी चादरें बुनीं थीं ?
अध्यात्म के पाखण्ड पर 
क्या सिसकते घाटों की व्यथा सुनी थी तुमने ? 
जब कबीर चौरा डूब रहा था कबीर के आँसुओं में 
क्या तुम्हारी पलकें नम हुई थीं ? 
गंगा का मैला आँचल देख 
कितनी बार उठी है तुम्हारे सीने में हूक ?
न जाने कितने मसीहाओं ने 
तुमको रास्ता बनाकर राजधानी तक की यात्रा की 
और तुम अस्सी के घाट पर बैठकर
चरस और गाँजे का आनंद लेते रहे । 
तुम्हारी संस्कृति के नूपुर के घुँघरू 
टूटकर बिखर गए गलियों में 
तुम महज़ एक ख्वाब बनकर रह गए ।
सारनाथ के तिलिस्मी दरवाजे की चाबी 
पहुँच गई श्रीलंका और जापान के हाथों 
ओ भारत की सांस्कृतिक राजधानी ! 
तुम्हारे ध्वस्त गलियारों में 
जब भी गूँजती है सपनों के सौदागरों की पदचाप 
और छली जाती हो तुम तो कसकता है कलेजा 
ओ मेरे बनारस ! 
तुम्हारा आहत अभिमान क्यों नहीं पूछता 
कि प्रसाद , बिरजू और अमीरुद्दीन के बाद 
काशी की किताब के पन्ने कोरे क्यों हैं ? 
ओ मेरे अभिमान ! 
तू सपनों के बाज़ार से लौट आ 
मिट्टी पर रह , बात कर मिट्टी वालों से 
देवताओं को फुर्सत नहीं स्वर्ग से
उनके पास तो मिट्टी वालों के लिए
सिर्फ सपनों के गुब्बारे हैं ।

Wednesday, 13 August 2014


आज़ादी  क्या  है इनकी  नज़र में ? 



            
 महादेवी बिरला वर्ल्ड एकेडमी की छात्राएँ स्वतंत्रता की परिभाषा  कुछ इस तरह से गढ़ती हैं -


 प्रेरणा  बैनर्जी - समान अधिकार मिलना  ही आज़ादी  है । 

  देबोलीना चैटर्जी -  इच्छानुसार हर कार्य करने का हक़ मिलना ही आज़ादी है । 

शिवांगी भक्कड़ - भेद - भाव से ऊपर उठना ही आज़ादी है । 

सिमरन अरोड़ा - प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार मिलना आज़ादी है । 

तन्वी वोरा - खुली हवा में साँस लेना , किसी के अधीन न रहना और अपनी इच्छा से जीवन जीना ही आज़ादी है । 

विधि अग्रवाल - जातिगत भेद - भाव से ऊपर उठना आज़ादी है । 

साओनी साहा - अपनी तरह से ज़िन्दगी को जीना  आज़ादी है । 

अलीज़ा रज़ा - अपने सपनों को आकार देना और अपने लक्ष्य को पा लेना  आज़ादी है । 

मेधावी गुप्ता - गरीबी का मिट जाना और हर भूखे तक रोटी का पहुँचना ही आज़ादी है । 

वेदांशी टिबरेवाल - कहीं भी स्वच्छन्दतापूर्वक जाने का अधिकार मिलना आज़ादी है । 

शाइक़ा इशाक - आज़ादी एक एहसास है । आज़ाद देश में सभी को समान सम्मान मिलना चाहिए । 

मीमांसा गुप्ता - जातिगत , धर्मगत और लिंग भेद से मुक्त होना ही आज़ादी है ।  


Tuesday, 8 July 2014

और वह पहाड़ बन गई …..



जब - जब तुमने  उसे रौंदना  चाहा धरती की तरह
वह  ऊपर उठी और आसमान बन गई
उसकी आँखों  में उगने लगे सपनों के इंद्रधनुष |
उसकी दृष्टि में तुमने उतार देना चाहा गहरा अँधेरा
 और वह खिलकर सुनहली  धूप  बन गई |
तुम बनाना चाहते थे उसे समतल खेत
कि उगा सको उसमें मनचाही फसलें
और वह पहाड़ बन गई |
तुमने उसे बनाना चाहा एक क्षीण रेखा जैसी नदी
कि सींचती रहे वह तुम्हारे भीतर का मरुस्थल

और वह समुद्र बन गई ।

Thursday, 3 July 2014

बारिश

बारिश ! एक खूबसूरत एहसास ! याद आती हैं गीली पगडंडियाँ , करौंदे , मेंहदी , सफ़ेद कुंइयाँ ,कमल के गुलाबी फूल , धान के खेत , झूले , कजरी , बूँदों के छल्ले , डगमगाती नाव , गंगा का मटमैला आँचल और माँ की आँखों के इंद्रधनुष ! बाबूजी की बाँहों का बरगद और उसके पत्तों से छन- छन कर गिरती वात्सल्य की बूँदे ! 
                                                                                                
  
बारिश जैसे ख्वाबों की दुनिया में लौटना , बारिश जैसे हथेलियों पर मोतियों का चमकना ,
बारिश जैसे मन के  आकाश में बादलों का घिरना ....                                           

Tuesday, 10 December 2013

गाँव की चौपाल

चलिए जनाब
लिए चलती हूँ मैं आपको
अपने गाँव की चौपाल में 
टपकती घास - फूस की छप्पर के नीचे
सर झुकाए बैठे हैं जो
जिनकी गाय दो घंटे पहले
जहर देकर मार दी गई
वह होरी नहीं हरिहर हैं ।
वे जानते हैं आरक्षित सीट पर बैठा दरोगा
नहीं लिखेगा उनकी रपट
शिकायत करने पर कहेगा -
" सालों ! तुम्हारे बाप -दादा ने
हमें जूते की नोक पर रखा
अब हमारी बारी है ।"
इसलिए खामोश हैं ।
विधायक जी चुनावी दौरे पर आये
तो पकड़ लिए सावित्री ने पाँव
बोली - दुहाई हो सरकार !
मंगरू ने तीन सौ रुपयों के एवज में
रेहन रख लिया है सारा  खेत ,
खाने बिना मर जाएँगे हुजूर ।
सरकार की नज़र 
टूटी दहलीज पर खड़ी बेटियों पर पड़ी
कहा -  कल इन्हें भेज देना मेरे डेरे पर
दाना - पानी की व्यवस्था हो जाएगी ।
सत्यवान का रक्त जम गया धमनियों में
सावित्री के सामने
यमराज बेटियों को न्योता देकर लौट चुका है ।
अब चलिए ज़रा
चेखुरी सिंह की चौपाल पर
ये जो अलाव में भून रहे हैं आलू
घीसू और  माधव नहीं
गोपाल और गनेश हैं
इन्होने अभी - अभी
पखंडुआ को खेत बेचा है
और पूर्वजों की धरोहर को
निपटाने का जश्न मना रहे हैं ।
ये जो चीख रही है झोपड़ी में
बुधिया नहीं सुगिया है
कुपोषण और काम के बोझ के मारे
चौथी बार जिसका गर्भपात हुआ है ।
गर्भपात स्वप्नों का
गर्भपात इच्छाओं का
गर्भपात इंसानियत का
देख लिया ?
आगे बढ़िये , देखिये
ये जो खोद रहे हैं खेतों में माटी
सतीश और गिरीश हैं
बी . एच .यू . से डबल एम .ए .
बेटों को " आदमी " बनाने का सपना
देखते , बुढ़ाते माता - पिता और परिवार के बोझ ने
असमय झुका दिया है इनके कंधों को
तीस की उम्र में पचपन के लगते हैं ।
आरक्षण ने " आदमी " नहीं बनने दिया
ठकुराई की ठसक ने झुकने नहीं दिया ।
ये देखिए
ठाकुर के कुएँ पर
लगी हुई है चुल्लूबाजों की मजलिस
मखाइन के पुल से " पाउचों " की पेटी
यहाँ रात तक बँटती है
मुर्गा और दारू पाकर
यहाँ सियासत जवान होती है ।
यहीं पर होता है नोटों से वोटों का सौदा ।
ये कुलदीपक इलाहाबाद जाकर
आई . ए . एस .  की तैयारी करते हैं
और भावी उच्चाधिकारी बनने का
सलोना स्वप्न दिखाकर
मोटी रकम ऐंठते हुए
बेटियों को ब्याह लाते हैं ।
मेरे गाँव की माटी में
घुल गया है राजनीति का ज़हर
विखंडित हवेलियों में
शिखंडियों की जमात लगा रही है
भीष्म की बोलियाँ
नेपथ्य में गूँज रहा है 
दुर्योधन का अट्टहास
पांचाली पृथ्वी किसे पुकारे
केशव प्रधानमन्त्री पद के
उम्मीदवार बने बैठे हैं ।
देख ली लीला लोकतंत्र की ?
महिमा मंडल मंत्र की ?
शक्ति लक्ष्मी यन्त्र की ?
बढ़िए , आगे बढ़िए , देखिए
खेदू हलवाई के घर
चूल्हा - चौका करने जा रही है जो  
रामराज सिंह की बेवा है
समूचे ठकुराने में किसी के पास
दो मुट्ठी अन्न नहीं है जिसके लिए
उसकी खातिर सहानुभूति की बड़ी बखार है ।
देखिए , नाक की ऊँचाई देखिए
पगड़ी की लड़ाई देखिए
पेट के लिए
होनेवाली जगहँसाई देखिये ।
दाएँ चलिए , ज़रा संभल के
यहाँ कीचड़ - कांदा थोड़ी खाँच  है
यह दुलारे दादा का दुआर है
कभी बैठा करती थी यहीं
गाँव की पंचायत
तब उनकी मूँछों पर ताव था
अपने ज़माने में उनका बड़ा भाव था ।
आज सरजू सरपंच का पाँव दबाते हैं
"अद्धे" पर अपना सब दाँव सिखाते हैं ।
बाएँ देखिए , यहाँ एक नदी फैली है
ऊपर से साफ़ पर अन्दर से मैली है
डूब मरी थी इसमें ही बजरंगी की बेटी
जिस दिन टिहुली के बेटे ने
गट्टा मरोड़कर गली में दबोचा था
और विरोध करने पर बजरंगी
डाल दिए गए जेल में
कितना कुछ हो गया खेल ही खेल में ।
हरखू के हाथ में हुकूमत का हाथी है
मुन्नर के मुँह में
मनमोहन का माखन है
सुन्दर की साइकिल
अब तेज - तेज चलती है
बुझे हुए दीयों में एक लौ सी जलती है ।
रोशनी रही न अब चन्दा के देश में
टूट रहे ग्रह नक्षत्र ऐसे परिवेश में ।
पीछे मुड़िये, सोचिए  ज़रा
ऐसा ही हाल है क्या
आपके भी गाँव का ?
रास्ते हैं ऐसे क्या मंज़िलें हैं ऐसी ही ?
पथरीली पगडंडी निर्मम सी राहों पर
ऐसा ही हाल है क्या
आपके भी पाँव का ?
अच्छा छोड़िये चौपाल की बात
कान लगाकर सुनिए
क्या कह रहा है आसमान ?
कहाँ से आ रही है यह आवाज ?
कह रही है जो -
उसने तुमको रौंदा है तुम उसको रौंदो
उसने तुमको काटा है तुम उसको काटो
उसने तुमको मारा है तुम उसको मारो
उसने तुमको दला बहुत तुम दलो उसे भी
उसने तुमको छला बहुत तुम छलो उसे भी ।
क्या सुन रहे हैं आप इन आवाजों को ?
ये लोकतंत्र का नारा है
ये नारा है आज़ादी का
पैगाम पतन का है इसमें
ये नारा है बरबादी का ।
चलिए जनाब ,
अब कैमरा रखिए, कलम पकड़िए
ज़रा लिख लीजिए मेरी बात
गरीबी का जाति से कोई वास्ता नहीं होता
ये डायन तो अपना सुहाग भी नहीं छोड़ती 
होरी हो या हरिहर
घीसू - माधव हो या गोपाल और गनेश
बुधिया हो या सुगिया
यह सबको लीलती है ।
भूख के तवे पर
संवेदना की बूँदें छनछनाकर जल जाती हैं
या भाप बनकर उड़ जाती हैं ।
लिखिए जनाब लिखिए
कि रोटियों का सम्बन्ध
सत्ता और संसद से नहीं खेतों से है
कि हमारे युवा इस इंद्रजाल से दूर
मुड़ें खेतों की ओर , बारिश की ओर
लौटें धूप की तरफ , मिट्टी की ओर
जहाँ रोटी की खुशबू है , भात की महक है
स्नेह का सौरभ है ,मेह की सुगंध है
धरती आकाश का सुन्दर अनुबंध है ।
कहिए जनाब कहिए
समझा क्या आपने तड़प की कहानी को ?
अंतर की पीड़ा को, आँखों के पानी को ?