Tuesday, 8 July 2014

और वह पहाड़ बन गई …..



जब - जब तुमने  उसे रौंदना  चाहा धरती की तरह
वह  ऊपर उठी और आसमान बन गई
उसकी आँखों  में उगने लगे सपनों के इंद्रधनुष |
उसकी दृष्टि में तुमने उतार देना चाहा गहरा अँधेरा
 और वह खिलकर सुनहली  धूप  बन गई |
तुम बनाना चाहते थे उसे समतल खेत
कि उगा सको उसमें मनचाही फसलें
और वह पहाड़ बन गई |
तुमने उसे बनाना चाहा एक क्षीण रेखा जैसी नदी
कि सींचती रहे वह तुम्हारे भीतर का मरुस्थल

और वह समुद्र बन गई ।

Thursday, 3 July 2014

बारिश

बारिश ! एक खूबसूरत एहसास ! याद आती हैं गीली पगडंडियाँ , करौंदे , मेंहदी , सफ़ेद कुंइयाँ ,कमल के गुलाबी फूल , धान के खेत , झूले , कजरी , बूँदों के छल्ले , डगमगाती नाव , गंगा का मटमैला आँचल और माँ की आँखों के इंद्रधनुष ! बाबूजी की बाँहों का बरगद और उसके पत्तों से छन- छन कर गिरती वात्सल्य की बूँदे ! 
                                                                                                
  
बारिश जैसे ख्वाबों की दुनिया में लौटना , बारिश जैसे हथेलियों पर मोतियों का चमकना ,
बारिश जैसे मन के  आकाश में बादलों का घिरना ....                                           

Tuesday, 10 December 2013

गाँव की चौपाल

चलिए जनाब
लिए चलती हूँ मैं आपको
अपने गाँव की चौपाल में 
टपकती घास - फूस की छप्पर के नीचे
सर झुकाए बैठे हैं जो
जिनकी गाय दो घंटे पहले
जहर देकर मार दी गई
वह होरी नहीं हरिहर हैं ।
वे जानते हैं आरक्षित सीट पर बैठा दरोगा
नहीं लिखेगा उनकी रपट
शिकायत करने पर कहेगा -
" सालों ! तुम्हारे बाप -दादा ने
हमें जूते की नोक पर रखा
अब हमारी बारी है ।"
इसलिए खामोश हैं ।
विधायक जी चुनावी दौरे पर आये
तो पकड़ लिए सावित्री ने पाँव
बोली - दुहाई हो सरकार !
मंगरू ने तीन सौ रुपयों के एवज में
रेहन रख लिया है सारा  खेत ,
खाने बिना मर जाएँगे हुजूर ।
सरकार की नज़र 
टूटी दहलीज पर खड़ी बेटियों पर पड़ी
कहा -  कल इन्हें भेज देना मेरे डेरे पर
दाना - पानी की व्यवस्था हो जाएगी ।
सत्यवान का रक्त जम गया धमनियों में
सावित्री के सामने
यमराज बेटियों को न्योता देकर लौट चुका है ।
अब चलिए ज़रा
चेखुरी सिंह की चौपाल पर
ये जो अलाव में भून रहे हैं आलू
घीसू और  माधव नहीं
गोपाल और गनेश हैं
इन्होने अभी - अभी
पखंडुआ को खेत बेचा है
और पूर्वजों की धरोहर को
निपटाने का जश्न मना रहे हैं ।
ये जो चीख रही है झोपड़ी में
बुधिया नहीं सुगिया है
कुपोषण और काम के बोझ के मारे
चौथी बार जिसका गर्भपात हुआ है ।
गर्भपात स्वप्नों का
गर्भपात इच्छाओं का
गर्भपात इंसानियत का
देख लिया ?
आगे बढ़िये , देखिये
ये जो खोद रहे हैं खेतों में माटी
सतीश और गिरीश हैं
बी . एच .यू . से डबल एम .ए .
बेटों को " आदमी " बनाने का सपना
देखते , बुढ़ाते माता - पिता और परिवार के बोझ ने
असमय झुका दिया है इनके कंधों को
तीस की उम्र में पचपन के लगते हैं ।
आरक्षण ने " आदमी " नहीं बनने दिया
ठकुराई की ठसक ने झुकने नहीं दिया ।
ये देखिए
ठाकुर के कुएँ पर
लगी हुई है चुल्लूबाजों की मजलिस
मखाइन के पुल से " पाउचों " की पेटी
यहाँ रात तक बँटती है
मुर्गा और दारू पाकर
यहाँ सियासत जवान होती है ।
यहीं पर होता है नोटों से वोटों का सौदा ।
ये कुलदीपक इलाहाबाद जाकर
आई . ए . एस .  की तैयारी करते हैं
और भावी उच्चाधिकारी बनने का
सलोना स्वप्न दिखाकर
मोटी रकम ऐंठते हुए
बेटियों को ब्याह लाते हैं ।
मेरे गाँव की माटी में
घुल गया है राजनीति का ज़हर
विखंडित हवेलियों में
शिखंडियों की जमात लगा रही है
भीष्म की बोलियाँ
नेपथ्य में गूँज रहा है 
दुर्योधन का अट्टहास
पांचाली पृथ्वी किसे पुकारे
केशव प्रधानमन्त्री पद के
उम्मीदवार बने बैठे हैं ।
देख ली लीला लोकतंत्र की ?
महिमा मंडल मंत्र की ?
शक्ति लक्ष्मी यन्त्र की ?
बढ़िए , आगे बढ़िए , देखिए
खेदू हलवाई के घर
चूल्हा - चौका करने जा रही है जो  
रामराज सिंह की बेवा है
समूचे ठकुराने में किसी के पास
दो मुट्ठी अन्न नहीं है जिसके लिए
उसकी खातिर सहानुभूति की बड़ी बखार है ।
देखिए , नाक की ऊँचाई देखिए
पगड़ी की लड़ाई देखिए
पेट के लिए
होनेवाली जगहँसाई देखिये ।
दाएँ चलिए , ज़रा संभल के
यहाँ कीचड़ - कांदा थोड़ी खाँच  है
यह दुलारे दादा का दुआर है
कभी बैठा करती थी यहीं
गाँव की पंचायत
तब उनकी मूँछों पर ताव था
अपने ज़माने में उनका बड़ा भाव था ।
आज सरजू सरपंच का पाँव दबाते हैं
"अद्धे" पर अपना सब दाँव सिखाते हैं ।
बाएँ देखिए , यहाँ एक नदी फैली है
ऊपर से साफ़ पर अन्दर से मैली है
डूब मरी थी इसमें ही बजरंगी की बेटी
जिस दिन टिहुली के बेटे ने
गट्टा मरोड़कर गली में दबोचा था
और विरोध करने पर बजरंगी
डाल दिए गए जेल में
कितना कुछ हो गया खेल ही खेल में ।
हरखू के हाथ में हुकूमत का हाथी है
मुन्नर के मुँह में
मनमोहन का माखन है
सुन्दर की साइकिल
अब तेज - तेज चलती है
बुझे हुए दीयों में एक लौ सी जलती है ।
रोशनी रही न अब चन्दा के देश में
टूट रहे ग्रह नक्षत्र ऐसे परिवेश में ।
पीछे मुड़िये, सोचिए  ज़रा
ऐसा ही हाल है क्या
आपके भी गाँव का ?
रास्ते हैं ऐसे क्या मंज़िलें हैं ऐसी ही ?
पथरीली पगडंडी निर्मम सी राहों पर
ऐसा ही हाल है क्या
आपके भी पाँव का ?
अच्छा छोड़िये चौपाल की बात
कान लगाकर सुनिए
क्या कह रहा है आसमान ?
कहाँ से आ रही है यह आवाज ?
कह रही है जो -
उसने तुमको रौंदा है तुम उसको रौंदो
उसने तुमको काटा है तुम उसको काटो
उसने तुमको मारा है तुम उसको मारो
उसने तुमको दला बहुत तुम दलो उसे भी
उसने तुमको छला बहुत तुम छलो उसे भी ।
क्या सुन रहे हैं आप इन आवाजों को ?
ये लोकतंत्र का नारा है
ये नारा है आज़ादी का
पैगाम पतन का है इसमें
ये नारा है बरबादी का ।
चलिए जनाब ,
अब कैमरा रखिए, कलम पकड़िए
ज़रा लिख लीजिए मेरी बात
गरीबी का जाति से कोई वास्ता नहीं होता
ये डायन तो अपना सुहाग भी नहीं छोड़ती 
होरी हो या हरिहर
घीसू - माधव हो या गोपाल और गनेश
बुधिया हो या सुगिया
यह सबको लीलती है ।
भूख के तवे पर
संवेदना की बूँदें छनछनाकर जल जाती हैं
या भाप बनकर उड़ जाती हैं ।
लिखिए जनाब लिखिए
कि रोटियों का सम्बन्ध
सत्ता और संसद से नहीं खेतों से है
कि हमारे युवा इस इंद्रजाल से दूर
मुड़ें खेतों की ओर , बारिश की ओर
लौटें धूप की तरफ , मिट्टी की ओर
जहाँ रोटी की खुशबू है , भात की महक है
स्नेह का सौरभ है ,मेह की सुगंध है
धरती आकाश का सुन्दर अनुबंध है ।
कहिए जनाब कहिए
समझा क्या आपने तड़प की कहानी को ?
अंतर की पीड़ा को, आँखों के पानी को ?


Monday, 14 January 2013

दामिनी के लिए

जिस दिन तुम जन्मी
क्यों नहीं बताया तुम्हारी माँ ने
दुनिया की असलियत
और यह सच्चाई
कि सूरज से चाँदनी नहीं मिलती
और रात से रौशनी |
राम और भीष्म की औलादें
नहीं किया करतीं
अग्नि परीक्षा और वस्त्रहरण का विरोध |
ओ मेरी बच्चियों सुनो ,
तुम धूप में तप लेना
पर उन पीपल और बरगदों की
छाया में मत जाना
जहाँ गिद्धों का बसेरा है |
सरकारी अभयारण्यों को
चिंता है सिर्फ गुम होते बाघों , शेरों और चीतों की
चिड़ियों की लुप्त होती प्रजातियाँ
उनकी चिंता का विषय नहीं है
इसलिए तुम शेरनी बनना
धार देते रहना अपने दांतों और नाखूनों को
कि भेड़िये तुम्हें घेर न सकें
सावधान रहना हर पल संभावित खतरों से |
न्यायपालिका से न्याय की अपेक्षा मत करना
लोकतंत्र के लोकनायकों के पास
अपनी बेटियों के बलात्कारियों के लिए भी
कोई दण्ड विधान नहीं है |
मत दिखाना कभी धृतराष्ट्रों को
अपने जख्मों के निशान
अंधे कर भी क्या सकते हैं ?
तुम्हें अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी
उठो , तैयार हो जाओ
वज्र बनो , ज्वालामुखी बनो ,
सुनामी बनो , कुछ भी बनो
पर लड़की की पारंपरिक परिभाषा तोड़ो
ओ मेरी बेटियों ! डायनामाइट बनो
उन्नत पर्वतों का वक्ष फोड़ो
ध्वस्त करो उन्हें जो तुम्हारे जीवन को
उन्मुक्त निर्झर नहीं बनने देते
धरती की तरह रौंदी जाओगी
आखिर कब तक ?
ओ मेरी दामिनियों चलो ,
फौलाद बनो , अपनी राहों को
नई दिशाओं की तरफ मोड़ो |

Tuesday, 28 August 2012

चलिए , दलित - दलित खेलते हैं |

चलिए , दलित - दलित खेलते हैं |
खेल कुछ इस तरह होगा
कि होरी करवाएगा
पंडित ' दातादीन ' का " गोदान "
पछाड़ खाकर ' धनिया ' नहीं , गिरेगी ' पंडिताइन '
' कफ़न ' के पैसों की 'पूरी '
 ' मेमसाहब ' खाएँगी
खुरचन खाकर घीसू - माधव
' आरक्षण ' का ढोल बजाएँगे
चौकी - बेलन , घी , पिसान सब उनका लेकर
चिकनी रोटी बेलते हैं '
चलिए , दलित - दलित खेलते हैं |
' हल्कू ' के खेत का चारा
नीलगायें नहीं ' नेताजी ' खायेंगे
डकार लेंगे घर में
संसद में भूख - भूख चिल्लायेंगे
" हंस " दलित विमर्श करेगा
"कौआ " चलेगा कुटिल चाल
आइये , एक दूसरे को गड्ढे की तरफ ठेलते हैं
चलिए दलित - दलित खेलते हैं |
' सदगति ' सबकी होगी
' दुखी ' की तरह पूरे देश की लाश
गिद्धों की टोली खाएगी
कलमें बिकेंगी , लिखेंगी
कुर्सियों की शान में कसीदे
आदमी आखिर ' आदमी ' है
वह अपनी भोर को करता रहेगा रात के हवाले
आस्तीनों में साँप पालने की फितरत
न आप छोड़ेंगे न हम
तो सर्प - दंश को थोड़ा आप झेलिये
थोड़ा हम झेलते हैं |
चलिए , दलित - दलित खेलते हैं |

Thursday, 23 August 2012

ख़्वाब

एक सुबह ऐसी हो 
कि हर होठों पर  
चमके हँसी तुषार बिंदु की तरह |
हर आँख बन जाये स्नेह का झरना
भावनाओं की उत्ताल तरंगें इस तरह  उठें
कि अंतर्मन उद्वेलित  हो सिन्धु की तरह |
लोग अविश्वास के  कंटीले जंगलों से निकल 
आस्था की सुरम्य घाटियों की सैर करने लगें ,
कोई किसी को न छले |
एक सुबह ऐसी हो
कि मसीहाओं की दुनिया में 
इंसान पूजे जाने लगें ,
सुनहली बालियाँ कर दी जाएँ भूखों के हवाले 
हर प्यासे अधरों पर गंगा की धारा मचलने लगे |
पत्थरों पर उग जाए ढेर सारी हरी दूब 
सूखी नदियाँ रसवंती बनकर
सूरज को अर्घ्य चढ़ाने लगें
वासंती रंग में रंग जाए धरती
नभ गुनगुनाने लगे |
एक रात ऐसी हो
कि चाँदनी अमावस को
मोतियों के नूपुर पहनाने लगे |

Saturday, 11 August 2012

रोटियों की खातिर

रोटी तो वहां भी थी
था नमक और प्याज भी
जिसे हथेलियों से फोड़कर
तुम मिर्च के साथ खाया करते थे
तब तुम्हारे सपनों में थे
बादल बरखा और हरे भरे खेत
गांव के डीह पर खड़ा बूढ़ा बरगद
तुमसे जी खोलकर बतियाता था
ऊसर पर उगा कुश भी
तब मखमल जैसा लगता था
और रात जब ओस के मोतियों से
पूरी धरती को सजा दिया करती थी
तो उसकी आभा से दीप्त तुम्हारी आंखों में
लहराने लगती थीं ढेर सारी सुनहली बालियां
तुम्हारी सोच कुछ ऐसी थी
कि अनाज से भरा कोठार
तुम्हें कुबेर का खजाना लगता था
सावन-भादो को पहचानते थे तुम
फागुन तुम्हें गुदगुदाता था
और फिर एक दिन
रोटियों के नाम पर
महत्वाकांक्षाओं के कोहरे से घिरे
तुम भटक गए किसी अनजान दिशा में
तुम्हारे पारदर्शी झूठ के पीछे से
पुकार कर कह रही थीं रोटियां
हे प्रवंचक , मिथ्याभाषी !
दिल पर हाथ रखकर कहो
क्या तुम्हारी लड़ाई वास्तव में
रोटियों की खातिर है
या अपनी रेगिस्तानी हसरतों को
दे दिया है तुमने रोटियों का नाम ?