Wednesday, 25 January 2012

माँ की आँखें

कभी भोर की पहली किरण सी ,
कभी गंगा की फेनिल लहरों सी
 माँ की आँखें लगती हैं
एक गहरी झील सी
जिसमें तैरते हैं ढेर सारे
सपनों के खूबसूरत कमल ।
आषाढ़ की पहली बरखा सी
मिटटी के दीप्त नन्हे दिए सी
किसी शिशु की मासूम हँसी की तरह
खिलखिलाती हैं और बिखेर देती हैं
गंधराज की खुशबू चारो तरफ ।
उन आँखों में दीखते हैं
ज़िन्दगी के हर रंग
सृष्टि का सारा सौंदर्य
फीका है उनके  सामने
उन आँखों में लहराते हैं 
वेदों , उपनिषदों ,गीता , रामायण के अक्स 
माँ की आँखों की गंगोत्री से 
निकलती है स्नेह की गंगा 
दीखती हैं उनमें हिमालय की 
अनंत श्रृंखलाएँ , उपत्यकाएँ
उन चमकती आँखों में दीखती हैं 
सारे उज्जवल नक्षत्रों की छायाएँ ।
 


Monday, 19 December 2011

सन्मार्ग १८ दिसंबर २०११ में प्रकाशित कवि डॉ . अभिज्ञात द्वारा लिखित मेरे कविता संग्रह ' आकाश की हद तक ' की समीक्षा

आकाश की हद को पार करती कविताएँ

'आकाश की हद तक 'नीलम सिंह  का पहला काव्य संग्रह है | हालाँकि वे बचपन से लिखती रही हैं और इस अवधि में विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं जिसके कारण काव्य जगत उनकी रचनाशीलता  से परिचित है |इस संग्रह से गुजरने के बाद पाठक के मन में उनकी रचनाशीलता के प्रति यह आश्वस्ति बोध होता है कि वे न सिर्फ एक संवेदनशील कवयित्री हैं बल्कि कविताओं में धार और बदलाव की अदम्य आकांक्षा है जो उनके रचे को व्यापक जनसमुदाय से जोड़ता है | उनकी कविताओं में घर - बाहर के बीच लगातार आवाजाही बनी रहती है और बाहर की दुनिया के लोगों की दुःख - तकलीफ उनकी अपनी व्यथा  - कथा से कतई अलग नहीं रहती | माँ के प्यार की नमी इस संग्रह की कई कविताओं में है और उनकी  कविताओं की दुनिया की कल्पना माँ की चर्चा के बिना लगभग असंभव लगती है | माँ की लोरियों की अनुगूँज अगर किसी कवि में लगातार बनी रहे तो उसका रचना-संसार अपने आप आत्मीय हो उठेगा , यह कहने में कोई हिचक नहीं | माँ को लेकर शायर मुनव्वर राना ने बेहतरीन शेर कहे हैं और उनकी जो व्यापक पहचान बनी है उसमें माँ से जुड़े मुद्दों का योगदान बहुत है | नीलम  सिंह की कविताएँ पढ़कर उनकी याद बरबस हो आती है | नीलम स्त्रियों के वजूद को पुरुषों से कमतर आँके जाने को स्वीकार नहीं करतीं और व्यापक अर्थों में स्त्री के अस्तित्व , उसकी शक्ति ,उसके आत्मसम्मान की पुरअसर अभिव्यक्तियाँ उनकी कई कविताओं में पूरी साहसिकता और शिद्दत से उपस्थित हैं | यह ऊर्जा का अक्षय श्रोत उन्हें ' माँ की विरासत ' के तौर पर मिला है | ' माँ की विरासत ' कविता में वे कहती हैं - 'एक शब्द कोष था / जिसमें बेटे - बेटी का अर्थ एक था / एक धरती थी मेरे पैरों के लिए / एक आकाश था मेरी मुट्ठियों के लिए / गहनों की पिटारी में रखे थे /अस्मिता और आत्मविश्वास जैसे शब्द / तुमने कुछ गुनगुनाया मेरे लिए / वह कविता आज भी खड़ी है मेरे साथ | ' उनकी कविताओं में माँ की ही बातें नहीं हैं बेटियों की भी बातें हैं , जिनकी मुश्किलों और हौसलों के साथ वे निरंतर बनी हुई हैं | उनके लिए कविता केवल  कोमल भावों को  व्यक्त करने  वाली विधा नहीं  है बल्कि उन्हीं के शब्दों में - ' मजबूत हाथ है कविता / जीती  जा सकती  है जिससे / बड़ी से बड़ी जंग ......समुद्र का विस्तार है / जो गुंजित कर सकती है पूरे ब्रह्माण्ड  को /वह  झंकार है  कविता | ' उनकी कविता में पीछे छूट गए गाँव की स्मृतियाँ और उसकी खुशबू है जो अपना  सम्मोहन पैदा करने में कामयाब है साथ ही  वैश्विक स्तर पर गरीब मुल्कों को और गरीब करने की साजिशों की खोज खबर भी है जो उनके रचनात्मक कैनवास के व्यापक होने का परिचायक है | 

Monday, 7 November 2011

तेज लहरों पर लिखी मेरी इबारत

तेज लहरों पर लिखी मेरी गज़ल
अब नहीं तुमसे मिटाई जाएगी
रेत मेरी ज़िन्दगी की ऐ हवा !
अब नहीं तुमसे उड़ाई जाएगी |
गीत हैं मेरे नहीं कोई शग़ल
चोट अंगारों की है मेरी गज़ल
हर किसी से ये ना  गाई जाएगी |
हैं छुपी इसमें कई परछाइयाँ
और कुछ मासूम सी तन्हाइयाँ
जो नहीं तुमसे रुलाई जाएँगी |
दीप बनकर दर्द जब जल जाएगा
ये अँधेरा सर्द सा ढल जाएगा
रोशनी ना ये छुपाई जाएगी |
हम समंदर में पले हैं इस तरह
और थपेड़े भी सहे हैं बेतरह 
ये निशानी ना दिखाई जाएगी | 




Friday, 4 November 2011

चेहरे

कैसे पहचाना जाए
कि जिस पर जमी हैं  अनगिनत परतें
उन चेहरों में असली कौन है ?
इन दिनों सभी के पास
पूर्ण प्रशिक्षित चेहरों की भरमार है
जो तुरंत पहचान लेते हैं 
देखनेवालों की आँखों का रंग 
और उसी में रंग जाते हैं |
ये खींच ले जाते हैं 
एक ऐसी दुनिया में 
जहाँ फरेब का जादू डाल देता है 
धीरे से सम्मोहन का जाल  
और शुरू हो जाता है
जादूगरी का खेल
फिर तो लोग वही देखते हैं 
जो चेहरे दिखाते हैं  
मायावी चेहरों की माया से
हम रोज चोट खाते हैं
पर कमाल की बात यह है
 कि सभी को बेपरत चेहरों से
परतों वाले चेहरे ज्यादा लुभाते हैं |

Sunday, 30 October 2011

स्मृतियों के वातायन से

ये १९८९ की बात है , गुरुवर राधेश्याम त्रिपाठी जी से मिलकर मैं  उनके गाँव प्रभुपुर से  बाबूजी के साथ  लौट रही थी | रास्ते में तूफ़ानी हवाएँ चलने लगीं उनका प्रवाह इतना तेज था कि कदम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे | मैंने बाबूजी का हाथ कसकर पकड़ रखा था , डर भी लग रहा था क्योंकि अँधेरा गहरा रहा था तभी बाबूजी ने कहा - " देखो बेटा हम प्रकृति के कितने करीब हैं " मैं सच में प्रकृति के साहचर्य को महसूस करने लगी ,भय कम होने लगा , पता ही नहीं चला कब हमारा अपना गाँव आ गया | आज भी जब कभी ज़िन्दगी में कोई तूफ़ान उठ खड़ा होता है  , उथल - पुथल मच जाती है तो लगता है बाबूजी कह रहे हैं " देखो बेटा हम ज़िन्दगी के कितने करीब हैं " और सच में उन विषम परिस्थितियों में भी मुझे  ज़िन्दगी की धड़कन सुनाई देने लगती है | जीवन के न जाने कितने मोड़ों पर उन्होंने मुझे भटकने से बचाया |  भवानीपुर एडुकेशन सोसाईटी कॉलेज में जब मैं साक्षात्कार देकर आई और मेरा चयन भी हो गया तो वहाँ पहले से पढ़ा रही मेरी सहकर्मियों ने मुझे बहुत डराया | उनमें एक मेरी कॉलेज की प्राध्यापिका भी थीं | उन्होंने कहा - जानती हो , यहाँ स्टुडेंट इतने बदतमीज़ हैं कि उपस्थिति लेते समय कुत्ते बिल्लियों की आवाजें निकालते हैं  , अनर्गल प्रश्न पूछते हैं | मुझे बड़ा अजीब लगा , घर आकर कहा मुझे ऐसे कॉलेज में नहीं पढ़ाना | बाबूजी हँसने लगे पास बुलाकर बैठाया फिर पूछा - क्यों ? क्या तुमको अपने पर विश्वास नहीं ? क्या तुम्हारे पास अपना व्यक्तित्व नहीं ? या  अपने विषय पर अधिकार नहीं ? कमजोर और डरपोक हो ? मैं चुप ! कहा ऐसी कोई बात नहीं | उन्होंने कहा मेरी बेटी होकर डरती हो ?  जाकर क्लास लो कुछ नहीं होगा | दूसरे दिन जब कॉलेज गई तो बी . ए. आनर्स वालों के साथ पहला पीरियड था | देखा मेरे कई विद्यार्थी मुझसे भी बड़े हैं , विचित्र स्थिति थी , मैंने बाबूजी की बातें याद कीं और मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई | बाद में कुछ दूसरे कारणों से मैंने वह कॉलेज छोड़ दिया | मेरे जीवन के संघर्षमय पलों में वे मेरे लिए रात - रात भर जागे , मैं पढ़ती तो वो मेरे लिए नोट्स तैयार करते | मेरे दादाजी लड़कियों की पढ़ाई के ख़िलाफ थे | जब मैंने हाईस्कूल की परीक्षा पाँच में से तीन विषयों में विशेष योग्यता के साथ पास किया तो सोचा दादाजी पिघल जायेंगे पर वो अड़ गए | मेरा दाखिला नहीं करवाया , माँ की उनके सामने कुछ चलती नहीं थी और बाबूजी कलकत्ता थे | मैं उन्हें हर दूसरे दिन चिट्ठी लिख -  लिखकर भेजती वो  आकर सब ठीककर देनेका आश्वासन देते |आखिरकार मेरे प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं
बाबूजी दशहरे के अवसर पर गाँव आये तो मेरा रोना - धोना शुरू हुआ कि मुझे हर हाल में पढ़ना है | वे उसी दिन धरांव इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य  चंद्रदेव चौबे जी से मिले और उनसे दाखिले  के लिए अनुरोध किया पर उन्होंने कहा की काफी देर हो चुकी है रजिस्ट्रेशन भी हो गया है अब कुछ नहीं हो सकता | बाबूजी ने   कहा  कोई  रास्ता   बताइए  यह   किसी  बच्ची  की  ज़िन्दगी  का  सवाल  है |      चौबेजी   ने कहा ठीक है आप इलाहाबाद बोर्ड से अनुमति ले आइये मैं दाखिला कर लूँगा | बाबूजी ने दौड़ भाग करके बोर्ड से अनुमति प्राप्त कर ली | ग्यारहवीं कक्षा में मेरा दाखिला हो गया , मेरे कक्षाध्यापक थे पंडित राधेश्याम त्रिपाठी जी | सब कुछ ठीक हुआ तो दादा जी ने दूसरी मुसीबत खड़ी कर दी कि मैं इसे विद्यालय नहीं जाने दूँगा क्योंकि वो कोएड स्कूल है | बाबूजी को समझ में नहीं आ रहा था क्या करें , वो मेरे लिए नौकरी छोड़कर घर बैठ नहीं सकते थे और उनके न रहने पर किसकी हिम्मत थी जो मुझे स्कूल भेजता | थक हार कर वो मेरे गुरूजी पंडित राधेशयाम त्रिपाठी जी की शरण में गए और उन्हें सारी कहानी बताई | वो दादाजी को बखूबी जानते थे | उन्होंने हर संभव सहायता का आश्वासन दिया | दादाजी और बाबूजी में समझौता यह हुआ कि मैं पढ़ाई घर पर ही करुँगी और विद्यालय सिर्फ परीक्षा देने जाऊँगी |  मजबूरन मुझे भी उनका यह  निर्णय स्वीकार करना पड़ा , मरता क्या न करता | उस समय बाबूजी ने मेरे लिए जो संघर्ष किया वह आजीवन याद रहेगा | नीलकमल की परीक्षा जल्दी हो जाती थी  वो कलकत्ता  में पढता था  | तब बाबूजी उसे गाँव भेज देते थे और वही मुझे परीक्षा दिलाने  कॉलेज साथ लेकर जाता था | कोई अध्यापक नहीं , कोई मार्गदर्शन  करने वाला नहीं , मैं अपनी सहेलियों से नोट्स माँगकर पढ़ती , रात -रात भर उसे लिखती क्योंकि दूसरे दिन उन्हें लौटाना होता था | संघर्ष करते हुए  बारहवीं की परीक्षा पास की | बाबूजी समझ गए कि अब गाँव पर मेरा रहना नहीं हो पायेगा क्योंकि दादा जी पढने देंगे नहीं और मैं पढ़े बिना जी नहीं पाऊँगी | दादा जी से लड़ - भिड़ कर वो मुझे कलकत्ता ले आये जहाँ से मेरे जीवन के दूसरे अनुच्छेद का आरम्भ हुआ |

                                                                      

Friday, 28 October 2011

गज़ल

यूँ सच ने कर दिए हैं कुछ सवाल दोस्तों
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !
गठरी फरेब की है इतनी उन्होंने बाँधी
अंधों के साथ हम भी कहते हैं उनको गाँधी
इतिहास को बदलना फितरत थी जिनकी यारों
वे हो गए हैं बेतरह बेहाल दोस्तों !
गूँगों की जीभ  पर भी अब शब्द मचलते हैं
नंगे भी सुबह शाम रोज वस्त्र बदलते हैं
चारो  तरफ उगे थे जंगल जो अंधेरों के
कटने पे  उनको हो रहा मलाल दोस्तों !
उतरे हैं कुछ मुखौटे चेहरे से खुदाओं के
कोई न रीझता है अब उनकी अदाओं से
मछली नहीं है कोई , खाली है समंदर भी
बैठे लाचार लेके अपना जाल दोस्तों !
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !

तुम्हारे नाम

मैंने समूची धरती 
कर दी है तुम्हारे नाम 
नहीं खींच सकता कोई भी 
तुम्हारे पैरों तले की जमीन |
आकाश कर दिया है
तुम्हारी आँखों के नाम
तुम्हारे स्वप्न उन्मुक्त विचर सकें |
हिमालय किया है
तुम्हारे कंधों के नाम
वहन कर सको हर भार !
कंटकित गुलाब है
तुम्हारे होठों के नाम
दर्द में भी मुस्कुरा सको |
नक्षत्रों से भरा नभ मंडल
सौंपा है तुम्हें
 कि लड़ सको अँधेरे से |
सारी नदियाँ , सारे समुद्र
तुम्हारे हिस्से हैं  
जीवन नहीं बनेगा मरुभूमि |
सुनो !
मैंने बाँध दिया है तुम्हारे सीने पर
अपने आशीष का कवच ,
नहीं छू पायेगा  तुम्हें कोई आघात |