Friday, 28 October 2011

गज़ल

यूँ सच ने कर दिए हैं कुछ सवाल दोस्तों
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !
गठरी फरेब की है इतनी उन्होंने बाँधी
अंधों के साथ हम भी कहते हैं उनको गाँधी
इतिहास को बदलना फितरत थी जिनकी यारों
वे हो गए हैं बेतरह बेहाल दोस्तों !
गूँगों की जीभ  पर भी अब शब्द मचलते हैं
नंगे भी सुबह शाम रोज वस्त्र बदलते हैं
चारो  तरफ उगे थे जंगल जो अंधेरों के
कटने पे  उनको हो रहा मलाल दोस्तों !
उतरे हैं कुछ मुखौटे चेहरे से खुदाओं के
कोई न रीझता है अब उनकी अदाओं से
मछली नहीं है कोई , खाली है समंदर भी
बैठे लाचार लेके अपना जाल दोस्तों !
घर झूठ के है मच गया बवाल दोस्तों !

तुम्हारे नाम

मैंने समूची धरती 
कर दी है तुम्हारे नाम 
नहीं खींच सकता कोई भी 
तुम्हारे पैरों तले की जमीन |
आकाश कर दिया है
तुम्हारी आँखों के नाम
तुम्हारे स्वप्न उन्मुक्त विचर सकें |
हिमालय किया है
तुम्हारे कंधों के नाम
वहन कर सको हर भार !
कंटकित गुलाब है
तुम्हारे होठों के नाम
दर्द में भी मुस्कुरा सको |
नक्षत्रों से भरा नभ मंडल
सौंपा है तुम्हें
 कि लड़ सको अँधेरे से |
सारी नदियाँ , सारे समुद्र
तुम्हारे हिस्से हैं  
जीवन नहीं बनेगा मरुभूमि |
सुनो !
मैंने बाँध दिया है तुम्हारे सीने पर
अपने आशीष का कवच ,
नहीं छू पायेगा  तुम्हें कोई आघात |


Wednesday, 19 October 2011

आकाश की हद तक { कविता संग्रह } नीलम सिंह

वागर्थ अक्टूबर २०११ में प्रकाशित नीलम सिंह के कविता संग्रह   "आकाश की हद  तक " की समीक्षा [ राधे श्याम त्रिपाठी ]

 "आकाश की हद छूने की कोशिश "

'आकाश की हद तक ' पढ़कर लगा आज का रचनाकार प्राचीन - अर्वाचीन के मध्य द्वन्द्वों से जूझता अपना पथ स्वयं प्रशस्त कर रहा है | संग्रह की कविताओं में भरपूर रस की पुष्टि हुई है| छंद तो अपने आप बोल रहे हैं | अलंकार की बात ही निराली है , रूपक ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया है | नए उपमान गढ़े गए हैं परन्तु पुराने से पीछा भी नहीं छुड़ाया गया है | वही द्रोण , धृतराष्ट्र , दुर्योधन , राम , कृष्ण , हनुमान , बुद्ध , गाँधी , राम अपनी - अपनी विशेष भूमिका में  दिखाई दे रहे हैं |
                                                                  इस रचना संग्रह में हमें समस्याओं  के प्रति छटपटाहट की गंध ही नहीं अपितु विद्रोही स्वर की भी अनुगूँज सुनाई दे रही है | नीलम ने जो देखा , जैसा देखा उस पर कलम बड़ी बेबाकी से चल पड़ी है | संसद से सड़क तक दृष्टि गई है राजनीति तो दुर्योधनों की दासी बनकर रह गई है | समाज कदाचार का कारखाना बन चुका है | धर्म प्रदूषित हो चुका है | पर्यावरण और जीवन से खिलवाड़ हो रहा है | भला ऐसी सामाजिक संरचना में कोई भी कलम का सिपाही क्या उगलेगा केवल शोले ही तो ?
                                                                  नीलम की रचनाओं में जहाँ एक ओर दीन - दलितों को उठाने की चीख - पुकार सुनाई दे रही है , वहीँ दूसरी ओर उसका सशक्त व्यक्तित्व भविष्य के प्रति आस्थावान एवं आशावान दिखाई दे रहा है | जहाँ नीलम ने मरे हुए समाज का अच्छा पोस्टमार्टम किया है वहीं उसकी धमनियों में नए रक्त संचार की क्षमता भी पैदा की है कल्पना के सहारे धरती - आकाश की दूरी  को ह्रदय के  ' टेप ' से नापकर ससीम कर दिया है | यही है वह धारा जिसमें कविता मुखरित होती है | यही है वह भाव - प्रवणता जो किसी कवि - लेखक को शोषितों का मसीहा घोषित कर देती है | नीलम की कविता में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग ' स्व ' को जिस प्रकार उजागर करता है वह अनागत के लिए इतिहास बन सकता है | इस संग्रह की कविताओं में आज के समाज का समग्र चित्र सिने - रील की तरह घूमता दृष्टिगोचर होता है |
                                                                     रचना धर्मी अपनी परिस्थिति , परिवेश और वातावरण से चोट खाकर वियोगी के आँसू की तरह अपनी कविता को बहा देता है ताकि लोग पढ़ें , समझें और अनुभव करें | भले - बुरे का विवेक तो मनुष्य में होता ही है भले ही वह उसपर पर्दा डाल दे | परिवार का स्वरुप ' छः लोगों का घर ' बड़ा ही प्रेरक है , जीवन की सच्चाई से जुड़ा है | ' बेटियाँ ' , ' बच्चे ' , ' घर ' इत्यादि में सत्य के दर्शन होते हैं | भ्रूण - हत्या पर आक्रोश स्वाभाविक है - " माँ ! भ्रूण - हत्या तो बेटों की होनी चाहिए फिर बेटियों को यह सजा क्यों दिलवाती हो ? " यह बड़ी मार्मिक , कारुणिक एवं जानदार पंक्ति है , रुग्ण मानसिकता पर कुठाराघात  है |
                                                                    रचना जब अपने मूल परिवेश से निकलती है तो मन को छू जाती है क्योंकि अपनी माटी की सोंधी गंध का स्वाद ही कुछ अलग सा होता है | " सावन सूखे खेतों में नहीं संसद में बरसता है " , " किसने रेहन रख दिया मेरा खूबसूरत सा गाँव ? " , " पुरवा ! जब मेरे देश जाना मेरी चन्दन माटी की गंध अपनी साँसों में भर लेना   "  ऐसी अभिव्यक्ति देनेवाली पंक्तियाँ हैं कि आज कार्पोरेट जगत से जुड़े लोग शायद ही इसकी अर्थवत्ता का मूल्यांकन कर सकें | " पर यही गाँठ जब पड़ जाती है  कोमल रिश्तों के बीच तो दर्द का सबब बन जाती है , ज़िन्दगी बेअदब बन जाती है " इसमें गाँठ की अनूठी व्याख्या है | यह सामाजिक सन्दर्भों की चुभन को दर्शाती है |
                                                                      " सुनो मनु !  तुम उसका इतिहास क्या रचोगे जिसने खुद तुम्हें रचा है ? " आज मनु महाराज होते तो अपने ऊपर यह टिप्पड़ी   देखकर अवाक रह जाते | उनका दंभ चूर - चूर हो जाता , लज्जा से मुख विवर्ण हो जाता | " माँ के लिए " संवेदनात्मक लय की अनुगूँज है , तुकांत और गेय कविता है | " तुलसी को अप्रासंगिक लगती है रामायण , क्योंकि राम और हनुमान ने बना लीं हैं अलग पार्टियाँ " करारा व्यंग्य है | सचमुच खेत खलिहान से निकलकर कविता कैसे " आकाश की हद तक " जाती है यह संग्रह इसका गवाह है | इसमें ऊर्ध्वगामी जिजीविषा की झलक मिलती है |

Tuesday, 18 October 2011

इस बार ...

इस बार
सर्दी की छुट्टियों में
ठण्ड से काँपती गंगा की लहरों को
उढ़ाऊँगी स्नेह का दुशाला
घाटों से पूछूँगी हाल - चाल
मंदिर की घंटियों में सुनूँगी
संस्कृति की झंकार
चंदनी माटी को चूमूँगी
गले मिलूँगी आम के पेड़ से
तालाब में पत्थर फेंककर
जगाऊँगी सोई मछलियों को
कोहरे की चादर में लिपटे
खेत - खलिहानों से करूँगी भेंट अंकवार
मिटटी के चूल्हे से फूटती 
पकते अनाज की खुशबू से 
भरूँगी मन - प्राण 
आँगन में खिले गुलाब को 
चौंका दूँगी चुटकियाँ बजाकर 
इस बार 
माँ की गोद से माँग लूँगी
आँख भर नींद , पलक भर सपना 
थोड़ी मनुहार , थोडा दुलार 
अंतस के सागर से एक बूँद प्यार !

Friday, 2 September 2011

मैं भी जीना चाहती हूँ.

ये धारदार औजार
काट रहे हैं मुझे
अलग हो रहा है
मेरे जिस्म का एक - एक टुकड़ा
बहुत दर्द हो रहा है माँ !
ये किस गुनाह  की सजा 
दे रही हो  मुझे इसतरह ?
अगर बेटी होना अपराध है
तो क्यों नहीं तुमने
यह सजा खुद को दी?
मेरे अंकुरित होने पर
तुम तो बड़ी खुश थी
एक मशीन तुम्हारे गर्भ पर घूमी
और मैं पल भर में अवांक्षित बन गयी
छटपटा रही हूँ मैं पीड़ा से
दम घुट रहा है मेरा
खो रही हूँ अपना अस्तित्व
माँ होकर कैसा उपहार
दे रही हो मुझे
छीन रही हो मुझसे मेरा जीवन
मैं भी देखना चाहती हूँ
ज़िन्दगी के रंग 
सुनना चाहती  हूँ ज़िन्दगी की धुन
पलना चाहती हूँ
तुम्हारे आँचल की छाया में
खेलना चाहती हूँ तुम्हारी गोद में
भैया की तरह
क्यों नहीं पहुँच रही है
तुम तक मेरी आवाज ?
मैं भी जीना चाहती हूँ
क्या जीने का हक ,  मुझे दोगी माँ ?

Monday, 29 August 2011

उठे हुए हाथ



जब भी उठते हैं हाथ
मुट्ठियाँ बाँधे लहराते हैं
इतिहास बदलता है
राज पथ सिकुड़ने लगता है
छोटे रास्ते चौड़े हो जाते हैं
अनगिनत अँधेरी रातों के बाद
फूटती है प्राची से
एक अरुणाभा
आकाश में गूँजती स्वर लहरियाँ
सुनती है संसद
सफेदपोशों का काला चेहरा
सामने आता है
जनतंत्र के पुनर्जन्म पर
मुस्कुराता है देश
उठे हुए हाथों  में
बड़ी ताकत होती है 
ये छीन लेते हैं
स्वर्ग में बैठे देवताओं का ताज
उठा लेते हैं उनकी थाली से
अपने हक़ की रोटियाँ
निकाल लेते हैं
पानी होते खून से
अपना लोहा |

Wednesday, 3 August 2011

पैसों का पुल

हर यात्रा शुरू होती है
इससे गुज़रने के बाद ही
चाहे वह पेट से रोटी तक की यात्रा हो
या आँखों से सपनों की
प्यास से पानी की
पलकों से नींद की
दर्द से सुकून की
कलम से शब्द की
मन से भावना की
देह से पसीने की
फूल से खुशबू की
बीज से अंकुर की
जीवन से मृत्यु की |
पैसों का पुल
पहुँचा देता है उन रास्तों पर भी
जिनका कोई छोर नहीं होता
परन्तु मृत्यु से जीवन की यात्रा में
काम नहीं आता
पड़ा रहता है परित्यक्त
पैसों का पुल |