Friday, 22 July 2011

बारिश

बारिश का आना !
जैसे माँ का लहराता आँचल |
पानी का बरसना !
ममता से भर आई हों जैसे
पिता की आँखें |
बूँदों का आलिंगन !
मिल रहे हों जैसे किसी अपने से
लम्बे अंतराल के बाद |
माटी की महक !
नवजात बच्चे की देह से
फूट रही हो जैसे सुगंध |
पत्तों का मर्मर संगीत !
बज रही हो प्राणों में
जैसे सरस्वती की वीणा |
बादलों का स्पर्श !
छू लिया हो जैसे किसी ने
लाड़ से , दुलार से |
गर्जना के स्वर !
मंदिर से उठ रही हो जैसे
पवित्र शंख ध्वनि |
गीली मिट्टी , गीला मन
घटाएँ जैसे मधुबन |
आसमान !
रोये - रोये से नयन |
बारिश में भींगना !
जीवन को जी भरकर जीना | 

Wednesday, 6 July 2011

उस दिन से अंजोरिया नहीं उतरी मेरे आँगन

सावन आता है ,
बरसती हैं आँखें हर बरस
तुम्हारी आखिरी राखी
जब बाँधती हूँ भाइयों की कलाई पर
स्मृतियाँ  चीर देती हैं सीना
एक दूसरे से नज़रें  चुराते
छुपाते अपने आँखों की नमीं
हम मर - मर कर जीते हैं
माँ की ममता तकिये में मुँह छुपाये
रात भर रोती है ,
बाबूजी का कंधा असमय झुक जाता है 
आँगन की तुलसी सिसकती है 
तीज त्योहारों पर परस देती हैं माँ 
आज भी चार थालियाँ 
त्रिशंकु की तरह हम तीन 
झूलते हैं यातना के आकाश में |
ये कैसी क्रूरता हुई हमारे साथ 
कि दूध  पिलाया जिन हाथों से
उसी से पिलाया तुलसी और गंगा जल !
तुम्हारे जाने के बाद
पूनम की रातें अमावस बन गईं
ओ मेरी चंदा !
जिस दिन तुम्हें खोया
उस दिन से अंजोरिया नहीं उतरी मेरे आँगन |

Saturday, 2 July 2011

अरे यायावर रहेगा याद ! [जलदापारा फ़ॉरेस्ट ]

वन की सुरम्य पगडंडियों से गुजरते हुए अनुभव हो रहा था कि एक पावन सुगंध वातावरण को सुरभित किये हुए है ठीक वैसे ही जैसे यज्ञ - कुण्ड से उठती महक मन -प्राण में रच - बस जाती है | वैदिक ऋचाओं सा गूँज रहा था वन का मधुर  संगीत ! पत्तों , किसलयों ,फलों - फूलों की महक मन को विभोर कर रही थी |
                                          संध्या का साँवला आँचल लहरा रहा था | आकाश का जादू देखने लायक था | नीले , पीले , गुलाबी , लाल , हरे , सुनहले रंगों के सरोवर में आकाश डुबकियाँ लगा रहा था | उस रंगीन सरोवर से नहाकर निकलते बादल सद्यः स्नात शिशुओं की तरह प्रतीत हो रहे थे | पक्षियों का कलरव वातावरण की निस्तब्धता को भंग  कर रहा था | वे अपने बसेरे को लौट  आये थे , शाखाओं पर अपनी जगह बनाने को अस्थिर हो रहे थे |
                              हम   घने वन के बीच प्रकृति के बिलकुल करीब थे , इतने निकट कि उसकी साँसों की अनुगूँज सुनाई पड़ रही थी जैसे माँ के वक्ष से लिपटे होने पर उसकी साँसों का स्पंदन सुनाई देता है | मन स्निग्ध भावनाओं के निर्झर में नहाने लगा ,होठों से फूटने लगे प्रार्थना के अस्फुट स्वर - ' विधाता ! हमें सदबुद्धि दो कि छाया देने वाले प्रकृति के आँचल को हम तार - तार न करें | ' आगे बढ़ते समय कुछ वन्य जीवों के दर्शन का सुयोग भी मिल रहा था | उस दिन हम शायद शुभ मुहूर्त में निकले थे | हरी झाड़ियों के बीच से निकलकर एक सुन्दर हिरण हमारे रास्ते के बिलकुल पास खड़ा हो गया ,हमने गाड़ी रोक दी ,वह शायद जड़ और हतप्रभ था , हिल भी नहीं रहा था | हमें भी उस भीतु प्राणि के इस व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा था | हमने जी भरकर उसकी तस्वीरें लीं ,वह लगभग पाँच मिनट तक वहीँ खड़ा रहा | गाड़ी स्टार्ट करने पर आवाज़ सुनकर भागा | थोड़ी दूर जाने पर जंगली भैंसों का एक झुण्ड मिला | सेनानायक ने हमें रुक जाने की चेतावनी दी | वह विशालकाय था प्रायः हाथी जैसा लम्बा -चौड़ा | रास्ते के बीचों - बीच खड़ा वह अपने साथियों को रास्ता पार करा रहा था और लगातार हम पर नज़रें रखे हुए था | गाड़ी की खिड़कियों के शीशे चढ़ाकर हम दम साधे बैठे हुए थे |रेंजर बता रहा था कि यदि यह आक्रामक हो जाय और हमारी तरफ पलट जाय तो बचना मुश्किल है | जंगली भैंसों के आक्रमण के कई किस्से उसने हमें बताये | जब वह चला गया तब हम आगे बढ़े | साम्भर  हिरण , बारहसिंघा ,जंगली सूअर और तरह -तरह के पशु - पक्षियों का अवलोकन करते जब हम हालाँग नदी के जल सतह पर पड़ती सूर्य की स्वर्ण - रश्मियों का नर्तन देखने लगे तभी दृष्टि समीप के एक वृक्ष पर पड़ी जिसकी शाखाओं पर सैकड़ों मोर -मोरनी बैठे हुए थे | ऐसा दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था |
                                    तोरसा नदी पार कर हम जिस जगह पहुँचे वहाँ हाथियों का झुण्ड मस्ती में झूम रहा था | कुछ के बच्चे भी उनके साथ थे | वन अधिकारी ओमप्रकाश ने उनके विषय में काफी जानकारियाँ दीं | शाम ढल रही थी और रात आने को थी | वन के सुरक्षा कर्मी पेट्रोलिंग के लिए निकल पड़े थे | मस्त गैंडे अपनी साम्राज्य सीमा में विहार करते नज़र आये | जलदापारा फ़ॉरेस्ट वैसे भी गैंडों के लिए ही  प्रसिद्ध है | चारो तरफ अँधेरा फैला हुआ था | हम तोरसा नदी के किनारे खड़े उसकी लहरों का संगीत सुन रहे थे | वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था | ड्राईवर प्रशांत ने कहा रात होने से पहले हम लौट चलें तो बेहतर होगा | मन मारकर हम वापस लौट पड़े | अँधेरा गहरा रहा था , अचानक प्रशांत ने कहा -' वो देखिये ! ' उसके इशारे पर हमने देखा एक हिरण एक गिरे हुए वृक्ष के तने पर बैठा हुआ था | आगे जाने पर वह जंगली भैंसा भी वापस दिख गया शायद वह टोह ले रहा था कि उसके क्षेत्र में अनाधिकार प्रवेश करनेवाले हम घुसपैठिये बाहर निकले कि नहीं |
                                            जंगल के बीच बने वाच टावर पर चढ़कर हमने वन के सौंदर्य को मन -प्राण भर निहारा | आकाश का सौंदर्य बदल चुका था | उसके काले फलक पर बिखरा सिन्दूरी रंग देख लग रहा था हम किसी परीलोक  में विहार कर रहे हैं | ड्राईवर ने खिड़कियों के शीशे ऊपर चढ़ा लेने को कहा क्योंकि खतरा हो सकता था और हम थे कि हाथ बाहर निकालकर तस्वीरें ले रहे थे | जी कर रहा था इस समूचे सौंदर्य को कैमरे में कैद कर लें | सुरेश नाराज हो रहे थे - ' तुम तो आकाश और बादलों को देख पागल हो जाती हो | ' बच्चे भी मना कर रहे थे | बुझे मन से मैंने सबकी भावनाओं का सम्मान करते हुए कैमरा रख दिया पर खिड़की खुली रही | मैं उस हवा को वन - गंध को छोड़ना नहीं चाहती थी | हमने और सोनू ने लगभग सात सौ तस्वीरें उतारी थीं | सब चिढ़ा रहे थे -' ये लोग भावी फोटोग्राफर हैं , इनके फोटो की प्रदर्शनी लगेगी | 'हम मुस्कुराते रहे |
                                                                दूसरे दिन सुबह पर्यटकों के शोर शराबे से नींद खुली तो खिड़की से देखा एक गैंडा रेस्ट हॉउस के बिलकुल करीब आ गया था वह पास के मैदान में रखे हुए नमक को खाने आया था जो वन - विभाग के कर्मचारियों ने रखा था | शहरी लोग उसे देखकर पागल हुए जा रहे थे | सुरेश ने उसकी बीसों तस्वीरें उतारीं और उसके क्रिया कलापों की देर तक रिकार्डिंग की | मैंने चुटकी लेते हुए कहा - ' क्यों जनाब ! मैं तो बादलों की बेटी हूँ पर आप कबसे गैंडा प्रेमी हो गए ? ' वे बोले अरे यार ! क्या मस्त अदाएँ है उसकी , देखो , देखो | हम सब ठहाका मारकर हँस पड़े | इस स्थान को कई बार देख चुकी हूँ ,परन्तु मन नहीं भरता जी चाहता है इसके सौंदर्य को ह्रदय में सदा के लिए बसा लूँ |
गठरी वाली औरतें

उनकी आँखों में
हँसता है भादो का आसमान
और साँसों में धान की दूधिया महक
बरगद के बरोह जैसी बांहों में
ब्रह्माण्ड  उठाये
अपने खुरदुरे पैरों से
धरती को गुदगुदाते
भीड़ भरी रेल में
बैठने की जगह बनाते
हँसते - खिलखिलाते
वे खोलती हैं अपनी गठरियाँ
और रोटियों के साथ
निगल जाती हैं समूचा दर्द
उनके जिस्म के सितार पर
बजती रहती है ज़िन्दगी की धुन 
उनके पसीने से आती है लोहे की गंध 
और शब्दों के धार से चीर देती हैं 
किसी का भी कलेजा 
अपने आँचल में बाँधकर
चटख रंगों वाले सपने 
वे खिल जाया करती हैं 
गर्मियों में गुलमोहर की तरह 
गठरी वाली औरतें महकती हैं 
कभी नागफनी , कभी गुलाब की तरह | 

 

Sunday, 26 June 2011

४ फरवरी १९८७ एक बीता हुआ कल

स्मृतियाँ भी कितनी अजीब होती हैं गाहे - बगाहे मन की दहलीज पर दस्तक देती रहती हैं , एक दिन अज्ञेय जी की कविता दूर्वादल पढ़ रही थी की यादें खींचकर अतीत में ले गयीं | अज्ञेय जी के साथ बिताये पल साकार हो उठे | उन्हें देखकर लगा सरोजिनी नायडू ने ठीक ही कहा था  -' कवि जब स्वयं सुरूप न हो  और व्यक्तित्वहीन हो तो वह सुन्दर रचना कैसे कर सकेगा ? ' अज्ञेय जी के विशाल एवं गरिमामय व्यक्तित्व का दर्शन कर हमारी कल्पनाएँ फीकी पड़ने लगीं , एक तेज सा प्रकाशित हो रहा था उनकी आँखों से | उनकी गंभीर मुख -मुद्रा देखकर प्रश्न पूछने का साहस नहीं हो रहा था पर यह अवसर हम खोना भी नहीं चाहते थे | उन्हीं दिनों बच्चन जी की एक टिप्पड़ी  कविता के सन्दर्भ में पढ़ी थी कि -'वर्त्तमान कविता को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पानी में डूब गया हो और उसे कृत्रिम सांस दिलाने की कोशिश की जा रही हो |' मैंने उसी सन्दर्भ  में  अज्ञेय जी से पूछा - क्या वास्तव में आज की कविता प्रभावशाली नहीं है ? वो मुस्कुराने लगे फिर कहा -मैं ऐसा नहीं मानता हाँ ,ह्रदय -पक्ष की कमी अवश्य है | आज का युग बुधिप्रधान युग है उसकी साहित्यकारों से ये माँग है कि उन्हें ऐसी रचना प्रदान की जाए और आधुनिक कविता लोकप्रिय भी है | जब समाज को ऐसा लगेगा कि उसे ह्रदय -पक्ष को महत्व देने वाली रचनाओं की जरूरत है और वह उसकी माँग करेगा तो साहित्यकार उसे अवश्य प्रदान करेगा | ' मैंने पुनः प्रश्न किया -आपने ' शेखर एक जीवनी ' में ऐसा क्यों लिखा है कि 'साहित्य का निर्माण मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है ? साहित्य सृजन में यह पीड़ा क्यों ? क्या आपको ख़ुशी नहीं होती जब लोग आपकी रचनाएँ पढ़ते हैं ,उससे प्रेरित होते हैं  ?अज्ञेय जी की मुख -मुद्रा गंभीर हो गयी ,उन्होंने कहा -'ख़ुशी होती तो है , ऐसा मैंने इसलिए कहा है क्योंकि यह कार्य वास्तव में बहुत कठिन है | हमारे मन में भावनाएं उठती हैं ,हम उन्हें अभिव्यक्त करते हैं पर रचना पूरी होने पर देखते हैं कि अरे ! यह तो वह है ही नहीं जिसे हम लिखना चाहते थे | तब अजीब सी झुंझलाहट होती है , उन्हें अभिव्यक्त कर देने पर एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है |'उन्होंने काल -चिंतन विषय पर वक्तृता  भी दी | आज भी उनके शब्द जैसी कानों में गूँजते हैं - 'महत्व जीवन में काल का नहीं ,क्षणों का है | हम अपने जीवन के पूरे समय को याद  नहीं रखते  ,याद तो विशेष क्षणों को ही करते हैं जो कुछ विशेष स्मृति से युक्त होते हैं  | ' कविता में अभिरुचि होने के कारण मैंने उनसे काव्य - लेखन के विषय में भी बहुत कुछ पूछा जैसे शब्द -प्रयोग में या कथ्य को अभिव्यक्त करने में ,या किसी नयी उपमा के चयन में क्या एहतियात बरतना चाहिए | मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर उन्होंने बड़े धैर्य से दिया | उन्हें एक कवि सम्मलेन में जाना था अतः हमें उनसे विदा लेनी पड़ी पर उनके सान्निध्य में कुछ और पल बिताने को दिल कर रहा था | फिर आया ४ मार्च १९८७ का दिन ! सुना , अज्ञेय जी नहीं रहे | विश्वाश न हुआ पर सत्य को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता था | वह विभूति जो कल तक हमारे बीच थी लुप्त हो गयी | लेकिन मन तो आज भी यही कहता है कि भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी रचनाएँ उनकी उपस्थिति का अनुभव हर पल कराती रहती हैं | जब भी उनकी कविता की पुस्तक का कोई पन्ना खोलती हूँ  तो उनका चेहरा शब्दों के बीच से झाँकने लगता है , काश वे पल दुबारा लौट आते !

Friday, 24 June 2011

धानी चूनर ओढ़े धरती झूम रही होगी , बरखा रानी के घुँघरू बज रहे होंगे ,खिलखिलाकर हँस रही होंगी गीली राहें , झिंगुरों की झनकार कानों में मधुरस घोल रही होगी ,मनचला आकाश अल्हड़ हवाओं से छेड़ -छाड़  कर रहा होगा , अपने बगीचे में गूँज रहा होगा एक मृदु मर्मर संगीत , नटखट बच्चे भींगते हुए पानी में कागज़ की नौकाएं तैरा रहे होंगे ,सबकुछ तो वही होगा , सिर्फ मैं वहाँ नहीं हूँ |

Thursday, 9 June 2011

तुम्हें कसम है धरती की ...

संधि ,सभा ,समझौते छोड़ो उठ जाओ
उलझ रहे हो क्यों बेमानी बातों में
बिता दिया सुबहों को तुमने सोने में
ढूँढ रहे सूरज अँधेरी रातों में
चोर -चोर  मौसेरे भाई होते हैं
मरने पर हँसते , जीने पर रोते हैं
इनकी फितरत समझ न पाएंगे हम - तुम
जादू है इनके मायावी  हाथों में |
छल ,प्रवंचना में ,धोखे में मत आओ
दर्द भरा है इन मीठे आघातों में
भ्रष्ट तंत्र के भ्रष्ट दरिन्दे बेच रहे
अपनी माँओं को , माँ जैसी माटी को
कहो बादलों से  गरजें , बरसें , टूटें
करदें बारूदी अपनी हर घाटी को
तुम्हें कसम है धरती की , सोओ मत ,जग जाओ
क्या रखा है किन्नर की बारातों में |