Saturday, 2 July 2011

गठरी वाली औरतें

उनकी आँखों में
हँसता है भादो का आसमान
और साँसों में धान की दूधिया महक
बरगद के बरोह जैसी बांहों में
ब्रह्माण्ड  उठाये
अपने खुरदुरे पैरों से
धरती को गुदगुदाते
भीड़ भरी रेल में
बैठने की जगह बनाते
हँसते - खिलखिलाते
वे खोलती हैं अपनी गठरियाँ
और रोटियों के साथ
निगल जाती हैं समूचा दर्द
उनके जिस्म के सितार पर
बजती रहती है ज़िन्दगी की धुन 
उनके पसीने से आती है लोहे की गंध 
और शब्दों के धार से चीर देती हैं 
किसी का भी कलेजा 
अपने आँचल में बाँधकर
चटख रंगों वाले सपने 
वे खिल जाया करती हैं 
गर्मियों में गुलमोहर की तरह 
गठरी वाली औरतें महकती हैं 
कभी नागफनी , कभी गुलाब की तरह | 

 

Sunday, 26 June 2011

४ फरवरी १९८७ एक बीता हुआ कल

स्मृतियाँ भी कितनी अजीब होती हैं गाहे - बगाहे मन की दहलीज पर दस्तक देती रहती हैं , एक दिन अज्ञेय जी की कविता दूर्वादल पढ़ रही थी की यादें खींचकर अतीत में ले गयीं | अज्ञेय जी के साथ बिताये पल साकार हो उठे | उन्हें देखकर लगा सरोजिनी नायडू ने ठीक ही कहा था  -' कवि जब स्वयं सुरूप न हो  और व्यक्तित्वहीन हो तो वह सुन्दर रचना कैसे कर सकेगा ? ' अज्ञेय जी के विशाल एवं गरिमामय व्यक्तित्व का दर्शन कर हमारी कल्पनाएँ फीकी पड़ने लगीं , एक तेज सा प्रकाशित हो रहा था उनकी आँखों से | उनकी गंभीर मुख -मुद्रा देखकर प्रश्न पूछने का साहस नहीं हो रहा था पर यह अवसर हम खोना भी नहीं चाहते थे | उन्हीं दिनों बच्चन जी की एक टिप्पड़ी  कविता के सन्दर्भ में पढ़ी थी कि -'वर्त्तमान कविता को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पानी में डूब गया हो और उसे कृत्रिम सांस दिलाने की कोशिश की जा रही हो |' मैंने उसी सन्दर्भ  में  अज्ञेय जी से पूछा - क्या वास्तव में आज की कविता प्रभावशाली नहीं है ? वो मुस्कुराने लगे फिर कहा -मैं ऐसा नहीं मानता हाँ ,ह्रदय -पक्ष की कमी अवश्य है | आज का युग बुधिप्रधान युग है उसकी साहित्यकारों से ये माँग है कि उन्हें ऐसी रचना प्रदान की जाए और आधुनिक कविता लोकप्रिय भी है | जब समाज को ऐसा लगेगा कि उसे ह्रदय -पक्ष को महत्व देने वाली रचनाओं की जरूरत है और वह उसकी माँग करेगा तो साहित्यकार उसे अवश्य प्रदान करेगा | ' मैंने पुनः प्रश्न किया -आपने ' शेखर एक जीवनी ' में ऐसा क्यों लिखा है कि 'साहित्य का निर्माण मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है ? साहित्य सृजन में यह पीड़ा क्यों ? क्या आपको ख़ुशी नहीं होती जब लोग आपकी रचनाएँ पढ़ते हैं ,उससे प्रेरित होते हैं  ?अज्ञेय जी की मुख -मुद्रा गंभीर हो गयी ,उन्होंने कहा -'ख़ुशी होती तो है , ऐसा मैंने इसलिए कहा है क्योंकि यह कार्य वास्तव में बहुत कठिन है | हमारे मन में भावनाएं उठती हैं ,हम उन्हें अभिव्यक्त करते हैं पर रचना पूरी होने पर देखते हैं कि अरे ! यह तो वह है ही नहीं जिसे हम लिखना चाहते थे | तब अजीब सी झुंझलाहट होती है , उन्हें अभिव्यक्त कर देने पर एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है |'उन्होंने काल -चिंतन विषय पर वक्तृता  भी दी | आज भी उनके शब्द जैसी कानों में गूँजते हैं - 'महत्व जीवन में काल का नहीं ,क्षणों का है | हम अपने जीवन के पूरे समय को याद  नहीं रखते  ,याद तो विशेष क्षणों को ही करते हैं जो कुछ विशेष स्मृति से युक्त होते हैं  | ' कविता में अभिरुचि होने के कारण मैंने उनसे काव्य - लेखन के विषय में भी बहुत कुछ पूछा जैसे शब्द -प्रयोग में या कथ्य को अभिव्यक्त करने में ,या किसी नयी उपमा के चयन में क्या एहतियात बरतना चाहिए | मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर उन्होंने बड़े धैर्य से दिया | उन्हें एक कवि सम्मलेन में जाना था अतः हमें उनसे विदा लेनी पड़ी पर उनके सान्निध्य में कुछ और पल बिताने को दिल कर रहा था | फिर आया ४ मार्च १९८७ का दिन ! सुना , अज्ञेय जी नहीं रहे | विश्वाश न हुआ पर सत्य को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता था | वह विभूति जो कल तक हमारे बीच थी लुप्त हो गयी | लेकिन मन तो आज भी यही कहता है कि भले ही आज वह हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी रचनाएँ उनकी उपस्थिति का अनुभव हर पल कराती रहती हैं | जब भी उनकी कविता की पुस्तक का कोई पन्ना खोलती हूँ  तो उनका चेहरा शब्दों के बीच से झाँकने लगता है , काश वे पल दुबारा लौट आते !

Friday, 24 June 2011

धानी चूनर ओढ़े धरती झूम रही होगी , बरखा रानी के घुँघरू बज रहे होंगे ,खिलखिलाकर हँस रही होंगी गीली राहें , झिंगुरों की झनकार कानों में मधुरस घोल रही होगी ,मनचला आकाश अल्हड़ हवाओं से छेड़ -छाड़  कर रहा होगा , अपने बगीचे में गूँज रहा होगा एक मृदु मर्मर संगीत , नटखट बच्चे भींगते हुए पानी में कागज़ की नौकाएं तैरा रहे होंगे ,सबकुछ तो वही होगा , सिर्फ मैं वहाँ नहीं हूँ |

Thursday, 9 June 2011

तुम्हें कसम है धरती की ...

संधि ,सभा ,समझौते छोड़ो उठ जाओ
उलझ रहे हो क्यों बेमानी बातों में
बिता दिया सुबहों को तुमने सोने में
ढूँढ रहे सूरज अँधेरी रातों में
चोर -चोर  मौसेरे भाई होते हैं
मरने पर हँसते , जीने पर रोते हैं
इनकी फितरत समझ न पाएंगे हम - तुम
जादू है इनके मायावी  हाथों में |
छल ,प्रवंचना में ,धोखे में मत आओ
दर्द भरा है इन मीठे आघातों में
भ्रष्ट तंत्र के भ्रष्ट दरिन्दे बेच रहे
अपनी माँओं को , माँ जैसी माटी को
कहो बादलों से  गरजें , बरसें , टूटें
करदें बारूदी अपनी हर घाटी को
तुम्हें कसम है धरती की , सोओ मत ,जग जाओ
क्या रखा है किन्नर की बारातों में |

Thursday, 28 April 2011

कुछ पल जो कभी नहीं भूलते

          ( १ )

बारिश में भींगने का सुख क्या होता है ये कौन नहीं जानता , हम भी उन बारिश की बूँदों की कोमल छुअन के लिए तरसते | मौका मिलते ही सबकी आँखों में धूल झोंककर  बाहर भाग जाते ,कभी तालाब से सफ़ेद कुइयों के ढेर सारे फूल तोड़ते , कभी पैरों में मिट्टी लपेट कर मिट्टी के जूते पहनते , कभी मछली पकड़ने के लिए कंटिया  लेकर तालाब के किनारे घंटों समाधि लगाते | एक दिन कुछ यूँ हुआ कि  मेरी  वंशी में एक बड़ी मछली फँस गई पास में ही भाई नीलकमल भी थे हमने मिलकर डोर को खींचना शुरू किया मछली ऊपर आई पर यह क्या ? कच्ची डोर टूट गई और मछली फिर से पानी के अंदर ! हमने जी भरके उसे कोसा फिर दोनों ने निर्णय लिया कि हार नहीं मानेगें | दुकान जाकर नई कंटिया और मजबूत धागा खरीदकर पुनः उस अभियान में लग गए | घंटों बाद तमाम प्रार्थनाओं के फलस्वरूप फिर एक मछली कांटे में फँसी इस बार कोई चूक नहीं हुई , हम उछलते -कूदते  उसे लेकर एक विजयी योद्धा की तरह घर लौटे और सबको अपनी गौरव गाथा सुनाई | माँ ने कहा अब बाहर मत निकलना पहले ही काफी भींग चुके हो | वह काम में  लग गयीं और हम फिर चम्पत  ! शाम हो गई थी हमने देखा नीम के पेड़ की जड़ों में एक गौरैया छटपटा रही है | वह बुरी तरह भींग  गई थी , अब उसकी जान बचाने का सवाल उठा , हम उसे बड़ी नजाकत से उठाकर दादाजी की  बैठक में ले गए और दीवार में बनी आलमारी  में रुई बिछाकर उसे रख दिया ,छुपकर खाने के लिए थोड़ा  चावल और पीने का पानी भी जुटा दिया , पहचान के लिए पंखों में लाल रंग लगा दिया | सारी व्यवस्था करके हम घर वापस आ गए |किसी को कानों -कान खबर नहीं हुई | रात भर नींद नहीं आई , हमारी बेचैनी देख माँ बार -बार पूछतीं क्या बात है ? तुमलोग इतने परेशान क्यों हो ? हम खामोश रहे | भोर होते ही धड़कते दिल से वहाँ पहुँचे  | सोच रहे थे पता नहीं बेचारी चिड़िया जिन्दा होगी या नहीं पर दरवाजा खोलते ही वह फुर्र से उड़ गई और सामने  नीम के पेड़ पर बैठ गई | हमारे बाल मन को गहरा आघात पहुँचा | तब हम स्वतंत्रता का अर्थ नहीं जानते थे , हमारे हिसाब से उसे कृतज्ञता पूर्वक हमारे साथ रहना चाहिए था क्योंकि हमने उसकी जान बचाई थी अतः हमने उसकी एहसानफरामोशी पर उसे धिक्कारा और भारी मन से लौट आये | अपनी दुःख भरी गाथा माँ को सुनाई तब वो हँस पड़ीं और आज़ादी की कीमत क्या होती है बताया |

Thursday, 21 April 2011

मासूम लड़कियों के भ्रूण एक झील में फेंक दिए गए थे जहाँ से बहते हुए गटर के गंदे पानी में तैर रहे  थे ,इसे  देखने के बाद मेरी आत्मा काँप उठी ,आजतक चैनल पर दिखाए गए इस दृश्य को मैं भुला नहीं पाती , जो माँ संतान की इज्ज़त करना नहीं जानती उसे माँ बनने का कोई हक़ नहीं ऐसा मैं मानती हूँ , प्रगतिशीलता का दावा करने वाला समाज खामोश क्यों है ? क्या हम अपाहिज हैं जो कुछ कर नहीं सकते ? इस तरह की वाहियात हरकतों का मैं पुरजोर विरोध करती हूँ ,और सबके सहयोग की कामना करती हूँ |




बेटियाँ
झील की सतह पर खिला
एक खूबसूरत फूल
कुचलकर , फेंक दिया गया
झील के पानी में
उस फूल से झाँक रहा था
मेरी बेटी का चेहरा
और शायद आपकी बेटी का भी
जो कह रहा था
माँ ! अपने ही रक्त माँस का टुकड़ा
कोई काटकर कैसे फेंक देता है ?
यह सवाल मुझे सोने नहीं देता
मेरी बेटी !
तुम्हारा प्रश्न ,मेरा भी है समाज से
कि आँखों खिला स्वप्निल गुलाब
कैसे फेंक दिया जाता है
किसी गटर या गन्दी नाली में
किसने हक़ दिया है हमें
कि छीन लें हम दूसरों से
उनके जीने का हक़ ?
यकीन मानो गुड़िया
यहाँ हर कोई जी रहा है
सिर्फ अपने लिए
तो तुम्हें भी आना होगा
झीलों , नालियों और गटरों से निकलकर
बंध्या करना होगा उन माँओं की कोख !
जिन्होंने तुम्हें मौत बाँटी है
बिटिया !
जिस समय तुम तोड़ रही होगी
भ्रूण हत्या करने वालों के हाथ
मेरा हाथ भी होगा तुम्हारे साथ |

Monday, 18 April 2011

याद
जिस दिन
गाँव की डगर छूटी
पाँव बढ़े शहर की
लम्बी सड़क पर
बार - बार थरथराये
होंठ कुछ कहने को फड़के
ट्रकों के बड़े पहियों के बीच
कुचले जाने की सम्भावना ने
मन को बेचैन किया
कुछ सपने थे
जिन्होंने हाथ थामकर
अजनबी राहों पर चलना सिखाया
धुएँ के गुब्बार के बीच
आँखें धुंधलाई
पर बनी रही सपनों की
चमक -चाँदनी
इन्द्र धनुषों के रंग में
रंगीन बना जीवन
अपने को खोकर
बहुत कुछ पाया
पर आज भी पुरानी राहें
जब पुकारतीं हैं प्यार से
बड़े रास्ते पराये लगने लगते हैं
सपनों की चाँदनी , इन्द्र धनुषों के रंग
फीके पड़ जाते हैं
भूलने लगते हैं किताबों के नाम
सिर्फ एक छोटी स्लेट
और कुछ दूधिया अक्षर
याद रह जाते हैं |