गठरी वाली औरतें
उनकी आँखों में
हँसता है भादो का आसमान
और साँसों में धान की दूधिया महक
बरगद के बरोह जैसी बांहों में
ब्रह्माण्ड उठाये
अपने खुरदुरे पैरों से
धरती को गुदगुदाते
भीड़ भरी रेल में
बैठने की जगह बनाते
हँसते - खिलखिलाते
वे खोलती हैं अपनी गठरियाँ
और रोटियों के साथ
निगल जाती हैं समूचा दर्द
उनके जिस्म के सितार पर
बजती रहती है ज़िन्दगी की धुन
उनके पसीने से आती है लोहे की गंध
और शब्दों के धार से चीर देती हैं
किसी का भी कलेजा
अपने आँचल में बाँधकर
चटख रंगों वाले सपने
वे खिल जाया करती हैं
गर्मियों में गुलमोहर की तरह
गठरी वाली औरतें महकती हैं
कभी नागफनी , कभी गुलाब की तरह |